सूफ़ियाना बसंत पंचमी...

फ़िरदौस ख़ान
सूफ़ियों के लिए बंसत पंचमी का दिन बहुत ख़ास होता है... हमारे पीर की ख़ानकाह में बसंत पंचमी मनाई गई... बसंत का साफ़ा बांधे मुरीदों ने बसंत के गीत गाए... हमने भी अपने पीर को मुबारकबाद दी... हमने भी अल सुबह अपने पीर को मुबारकबाद दी... और उन्होंने हमेशा की तरह हमें दुआएं दीं...

बसंत पंचमी के दिन मज़ारों पीली चादरें चढ़ाई जाती हैं, पीले फूल चढ़ाए जाते हैं... क़व्वाल पीले साफ़े बांधकर हज़रत अमीर ख़ुसरो के गीत गाते हैं...
कहा जाता है कि यह रिवायत हज़रत अमीर ख़ुसरो ने शुरू की थी... हुआ यूं कि हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रह) को अपने भांजे सैयद नूह की मौत से बहुत सदमा पहुंचा और वह उदास रहने लगे. हज़रत अमीर ख़ुसरो से अपने पीर की ये हालत देखी न गई... वह उन्हें ख़ुश करने के जतन करने लगे... एक बार हज़रत अमीर ख़ुसरो अपने साथियों के साथ कहीं जा रहे थे... उन्होंने देखा कि एक मंदिर के पास हिन्दू श्रद्धालु नाच-गा रहे हैं... ये देखकर हज़रत अमीर ख़ुसरो को बहुत अच्छा लगा... उन्होंने इस बारे में मालूमात की कि तो श्रद्धालुओं ने बताया कि आज बसंत पंचमी है और वे लोग देवी सरस्वती पर पीले फूल चढ़ाने जा रहे हैं, ताकि देवी ख़ुश हो जाए...
इस पर हज़रत अमीर ख़ुसरो ने सोचा कि वह भी अपने औलिया को पीले फूल देकर ख़ुश करेंगे... फिर क्या था. उन्होंने पीले फूलों के गुच्छे बनाए और नाचते-गाते हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया (रह) के पास पहुंच गए... अपने मुरीद को इस तरह देखकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट आ गई... तब से हज़रत अमीर ख़ुसरो बसंत पंचमी मनाने लगे...


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नारी की नारी की संपूर्णता और प्रेम...

फ़िरदौस ख़ान
समय बदला, हालात बदले लेकिन नहीं बदली तो नारी की नियति. नारी सदैव प्रेम के नाम पर छली गई. उसने पुरुष से प्रेम किया, मन से, विचारों से और तन से. मगर बदले में उसे क्या मिला धोखा और स़िर्फ धोखा. पुरुष शायद प्रेम के महत्व को जानता ही नहीं, तभी तो वह नारी के साथ प्रेम में रहकर भी प्रेम से वंचित रह जाता है, जबकि नारी प्रेम में पूर्णता प्राप्त कर लेती है. राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डॉ. प्रतिभा रॉय की पुस्तक महामोह अहल्या की जीवनी में नारी जीवन के संघर्ष की इसी कथा-व्यथा को मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है. डॉ. प्रतिभा रॉय कहती हैं कि अहल्या एक पात्र नहीं, एक प्रतीक है. जब प्रतीक व्याख्यायित होता है, तब एक पात्र बन जाता है. जब पात्र विमोचित होता है, तब दिखने लगता है प्रतीक में छिपा अंतर्निहित तत्व. अहल्या सौंदर्य का प्रतीक है, इंद्र भोग का, गौतम अहं का प्रतीक है, तो राम त्याग एवं भाव का प्रतीक है. महामोह की अहल्या वैदिक नहीं है, पौराणिक नहीं है, ब्रह्मा की मानसपुत्री नहीं है, वह ईश्वर की कलाकृति हैं, चिरंतन मानवी हैं. वैदिक से लेकर अनंतकाल तक है उनकी यात्रा. वे अतीत में थीं, वर्तमान में हैं, भविष्य में रहेंगी. मोक्ष अहल्या की नियति नहीं, संघर्ष ही है उनकी नियति. अहल्या के माथे से कलंक का टीका नहीं मिटता. अत: अहल्या देवी नहीं है, अहल्या है मानवीय क्रांति. अहल्या का संघर्ष केवल नारी का संघर्ष नहीं है, न्याय के अधिकार के लिए मनुष्य का संघर्ष है.
अहल्या अपने द्वार पर आए इंद्र से पूछती है-क्या वरदान चाहिए प्रभु?
मैं हाथ जो़डे ख़डी थी. अपने मनोरम हाथ ब़ढाकर उन्होंने मेरी हथेली को स्पर्थ किया. स्पर्श के अहसास से ज़ड में भी जान आ जाती है. यह कैसा मधुकंपन होने लगा मेरे भीतर? अनुभूत सुख ढूंढते-ढूंढते मानो मैं परमानंद प्राप्त करने का जा रही थी. अपने हाथ का स्पर्श देने से अधिक भला मैं और क्या कर सकती थी? एक स्पर्श में ही अथाह शक्ति होती है? मेरा लौहबंधन तार-तार हो गया स्पर्श की शक्ति से. महाकाल के वक्ष पर वे अभिलाषा पूर्ण घ़िडयां थीं नि:शर्त. वहां लाभ-हानि, यश-अपयश, अतीत-भविष्य, स्वर्ग-नर्क, वरदान-अभिशाप का द्वंद्व नहीं था, जबकि प्रतिश्रुति, वरदान और प्रतिदान की कठोर शय्या पर पैर रखकर उतर आई थीं वे घ़िडयां देह से मनोभूमि में.
मुझे यह अनुभूति हुई कि सारी सीमाएं अनुशासित होते हुए भी मेरे भीतर ऐसा कोई नहीं था, जिसने मुझे अगम्य स्थान की ओर उ़ड जाने को प्रेरित किया. उस शक्ति ने सारे बंधन और बेडियां तो़ड डालीं. बे़डियां तो़डना मनुष्य का सहज स्वभाव है. रिश्ते जब बे़डियां बन जाते हैं, तभी वे रिश्ते टूटते हैं, बंधन टूटते हैं. बंधन टूटने के विषाद और मुक्ति के उद्‌घोष एवं विषाद-प्रफुल्लित भावावेग से वे घ़िडयां थीं मधुर पी़डादायी. वह घ़डी, निष्कपट समर्पण की घ़डी है. स्वयं को दूसरे के लिए उ़डेल देने की घ़डी. वह घ़डी थी प्रेम की घ़डी, जिस प्रेम मंं दूसरा पक्ष नहीं होता. लेन-देन का हिसाब नहीं होता. उस घ़डी का आकर्षण दुर्दम्य होता है कि वहां पाम-पुण्य, नीति-नियम अंधे और बहरे हो जाते हैं. उस घ़डी मेरे भीतर छल-कपट नहीं था. वह घ़डी निष्कपट, विशुद्ध प्रेम की घ़डी थी. उस समय मैं विभाजित नहीं थी. पूरी की पूरी इंद्र की थी. वह घ़डी भ्रांति की घ़डी नहीं थी, क्रांति की घ़डी थी. उस घ़डी ने प्रलय को स्तब्ध कर दिया था.
मैं नहीं जानती, प्रेम की वह घ़डी इंद्र के लिए नि:शर्त और निष्कपट थी या नहीं, किंतु नारी के लिए प्रेम नि:शर्त होता है. देह भोग की वासना उस प्रेम की शर्त नहीं होती, किंतु क्या पुरुष के लिए देह भोग प्रेम की शर्त है? अत: प्रेम की उपलब्धि से इंद्र की अपूर्णता पूर्ण हुई या नहीं, मैं नहीं जानती. किंतु मैं पूर्ण, परिपूर्ण हो गई थी. मैं इंद्रलुब्धा नहीं थी-मैं थी इंद्रमुग्धा. मैं इंद्र से होकर उत्तरण के सोपानों पर च़ढती जा रही थी, पृथ्वी की अतल में, आकाश से होते हुए आकाश से भी ऊंची. इंद्रिय आनंद से इंद्रानंद में-परमानंद की उपलब्धि में. इंद्रानंद सोमरस पान की तरह अपार्थिव है.
आत्म मुक्ति या जगत की मुक्ति? इस प्रश्न का उत्तर इंद्र पा चुके थे. आत्म मुक्ति के द्वार पर इंद्र सदैव बाधा उत्पन्न करते हैं. क्या गौतम के यक्ष का लक्ष्य आत्म मुक्ति था? अपरिपक्व, ज्ञान, साधना और अनुभूति के बिना उत्तरण, मुक्ति और अमरत्व की कामना करना विडंबना है. देवतागण मनुष्य की इस बुरी आकांक्षा का विरोध करते हैं. संभवत: इसलिए इंद्र ने गौतम का विरोध किया और मुझे प्रदान की सत्य की अंतरंग अनुभूतियां. स्वाहा है यक्ष की आत्मा. यक्ष के मंत्र का अंतिम और श्रेष्ठ भाग है स्वाहा. सु-आहुति स्वाहा का श्रेष्ठ गुण है. मैंने इंद्रदेव के लिए स्वयं को स्वाहा कर दिया. मेरी मिथ्या देह है सत्य की सिद्धिभूमि. मैं थी कन्या, पत्नी, गृहिणी, किंतु मैं नारी नहीं बन पाई थी. इंद्र के स्पर्श से मैं नारी बन गई. मैं पूर्ण हो गई. पूर्ण से पूर्ण निकालने की शक्ति भला किसमें है? यदि किसी में हुई तो पूर्ण से पूर्ण निकल जाने पर भी मैं पूर्ण ही रहूंगी.
हे, इंद्रदेव! मैं कृतज्ञ हूं. आपने मुझे पूर्णता का अहसास कराया. आपने मेरे ज़ड बन चुके नारीत्व में फिर से प्राण फूंक दिए.
मैंने इंद्रदेव को प्रणाम किया. प्रभात हो चला था. क्या पक्षियों ने रात का महाप्रलय का सामना नहीं किया? उनके कलरव में कहीं कोई अस्वाभाविकता नहीं थी. इंद्रदेव प्रस्थान करने को उतावले थे. विदा की घ़डी आ गई. इंद्रदेव निर्लिप्त-निराकार थे. किंतु वे तृप्त थे, यह स्वीकारने में उनमें कोई झिझक नहीं थी.
अहल्या, मैं तृप्त हुआ. तुम्हारा दान अतुलनीय है. प्रेम की चिर-आराध्या देवी बनकर तुम मेरी अंतरवेदी में सदैव पूजी जाओगी. आज के इस देह-संगम की स्मृतियां, तुम्हारी देह की सारी सुरभित सुगंध मेरी देह की समस्त ग्रंथियों में सदा भाव-तरंग बनाते रहेंगे. तुम्हारे पति के पदचाप सुनाई देने लगे हैं. मैं तुम्हारा मुक्तिदाता नहीं, मैं तुम्हारा भाग्य और नियति नहीं. मैं तुम्हारी परीक्षा भी नहीं. तुम स्वयं ही अपनी परीक्षा, भाग्य और नियति हो. साधना का द्वार अब तुम्हारे लिए खुल चुका है. मुझे विदा दो और अपनी रक्षा करो.
इंद्र के विदा होते समय मुझे ठेस नहीं पहुंच रही थी, क्योंकि मैं जानती थी, मैं मर्त्य की नारी हूं. इंद्र मेरे भाग्यविधाता नहीं बन सकते. यह विदाई तय थी. किंतु मुझे ऐसी अवस्था में छो़डकर, गौतम के पहुंचने से पहले किसी लम्पट पुरुष की तरह जल्दी-जल्दी वहां से भागने लगना मुझे बहुत कष्ट दे रहा था. तो क्या इंद्र भाव के सम्राट नहीं हैं, क्या वे भोग-लम्पट हैं, एक सामान्य पुरुष? क्या मेरे क्षणभंगुर सुंदर देहभूमि पर विजय पताका फहराकर गौतम को नीचा दिखाना था इस प्रेम का लक्ष्य? तब तो यह प्रेम नहीं था, एक भ्रांति थी. क्या मैं इंद्रयोग्या नहीं थी, इंद्रभोग्या थी? यह सोचकर दुख और आत्मग्लानि से उदास हो उठी. इंद्र ने गर्व के साथ गौतम का सामना किया होता तो मैं इंद्र को परम प्रेमी के स्थान पर रखकर बाक़ी का जीवन पूर्णता से रंग लेती. प्रेम निर्भीक होता है, प्रेम निरहंकार होता है, प्रेम नि:स्वार्थ होता है, जबकि एक कामुक पुरुष की तरह अपने स्वार्थ को ब़डा करके ऋषि के कोप के भय से मुझे असहाय अवस्था में छोड कर वहां से खिसक लेने के कारण मेरे सच्चे अहसास पर एक काली रेखा खींच दी उन्होंने. यह प्रेम है या भ्रम, पाप है या पुण्य? उचित है या अनुचित?
किंतु मैंने जो कुछ किया, जान-बूझकर किया. जब आत्मा प्रेम के लिए समर्पित हो जाती है, तब देह अपनी सत्ता खो देती है और आत्मा के साथ देह भी समर्पित हो जाती है. इसलिए उस क्षण मुझमें ग्लानि या पापबोध नहीं हुआ. मिलन के सुख और विरह के दुख दोनों से मेरा नारीत्व आज परिपूर्ण था.
बहरहाल, यह किताब बेहद रोचक है. लेकिन संस्कृतनिष्ठ हिंदी होने के कारण पाठकों को कुछ शब्दों को समझने में द़िक्क़त पेश आ सकती है. अगर भाषा थो़डी सरल होती तो सोने पे सुहागा होता.

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पश्चिमी संस्कृति की गाथा

फ़िरदौस ख़ान
कश का विनाश इतालवी लेखक की पुस्तक द रुइन ऑफ कश का हिंदी अनुवाद है. यह एक अच्छी बात है कि विदेशी भाषाओं की श्रेष्ठ पुस्तकों का हिंदी अनुवाद आसानी से मिल जाता है. इस पुस्तक का अनुवाद बृजभूषण पालीवाल ने किया है. हक़ीक़त में यह किताब पश्चिमी संस्कृति, साहित्य, क्रांति और प्रबोधन की गाथा है. पैनोरामा मेस में इटालो काल्विनो लिखते हैं-द रुइन ऑफ कश, दो विषय लेती है. प्रथम है टैलीरॉ और दूसरा है बाकी सब चीजें. और बाकी सब चीजों में वे सब चीजें शामिल हैं, जो मानव इतिहास में घटित हुई हैं, सभ्यता की शुरुआत से लेकर आज तक. यह एक ऐसी पुस्तक है जो अपने आपको एक भटकन और आवारापन में उजागर करती है, अपनी कल्पना, मनमर्जी और कभी न तृप्त होने वाली जिज्ञासा से मार्गदर्शन प्राप्त करती है, और बनी हुई है टुकड़ों से, इधर-उधर भटकने से, कहानियों, लघुकथाओं और कहावतों से. यह सब इसलिए कि इसे एक अविरल आनंद के साथ पढ़ा जा सके.

सिविलिजेशन में जे टॉल्सन लिखते हैं-ऐसा लगता है कलासो ने मांग करती और कुरेदने वाली पुस्तक को बनाने में कम से कम एक राष्ट्रीय पुस्तकालय को खंगाला होगा. इसकी विषय वस्तु आधुनिक मस्तिष्क का छिछलापन है और आधुनिक संस्कृति की कार्यविधि के कारण ही जिसका कलासो ऐसी बारीकी से विश्लेषण करते हैं. मैं उस विश्लेषण का प्रयोग करने में हिचक रहा हूं ,जिसके योग्य यह पुस्तक सर्वथा है. मास्टर पीस सभी महान पुस्तकों की भांति यह पुस्तक हमें अधिक पढ़ती है और हम इसे कम पढ़ते हैं और कला या चिंतन की महान रचनाओं के समान ही यह आपको अपना जीवन बदलने के लिए विवश कर सकती है.

रॉबर्तो कलासो लिखते हैं- सबसे सहज और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पूछना चाहिए, क्या वैदिक संबंध सच्चे हैं. उनका अध्ययन करते समय हम धीरे-धीरे उनके अद्भुत पेचीदा जाल को, हर चीज़ पर फैला हुआ है, दोबारा बना लेते हैं. और जिस क्षण से हम संसार में प्रवेश करते हैं, हम यह देखने पर विवश हैं कि यह माचिस की तीलियों का विशाल गिरजाघर है, श्रेष्ठ और निरर्थक. हम जानते हैं कि जीवन स्वयं को किसी न कियी तरीके से, इनकी सहायता के बिना भी पुन उत्पन्न कर लेता है. फिर भी हम गुंजन की उन परतों की ओर, जो हर चीज़ को अपने अंदर लपेटे हुए है, अदम्य रूप से आकृष्ट होते हैं. और हम चाहें जो कुछ सोचें एक बिंदु पर हम यह अनुभव करते है. कि न चाहते हुए भी हम उस अधडूबे लबादे के एक कोने का प्रयोग करते हैं. वैदिक संबंधों को पूरी तरह अस्वीकार करने में सफ़ल होने वाला जीवन का एकमात्र स्वरूप बैन्थम का है, हमारा फ़राओ आज लंदन में एक ममी है. एक अनजान जीवन. वैदिक संबंध भव्य रूप में निरर्थक हैं तो बैन्थम भव्य रूप से अपर्याप्त. हम अधर में लटके रहे हैं, भटकते हुए.
किसी ऐसे व्यक्ति के होठों पर बलिदान की भाषा सर्वाधिक घिनौनी या काल्पनिक लगती है, जो उसके आधार वाक्य को नहीं जानता. किसी ऐसे व्यक्ति के हाथों बलिदान का कर्म अत्यंत विध्वंस भरा लगता है जो इसके आधार वाक्य तक को नहीं जानता. किसी ऐसे व्यक्ति से बलिदान संबंधी शब्द सुनने और इसके हाव-भावों को देखने से अधिक बुरा कुछ नहीं जो इसके आधार वाक्य तक को नहीं जानता. वरुण वह उद्गम है जो जीवन को रोकता है और जिसके बिना जीवन असंभव है. जीना शुरू करने के लिए वरुण के फंदे कटने चाहिए और जीते रहने के लिए हमें आदिकालीन द्रव से गीला होने, इससे जुड़ने की ज़रूरत है.

वर्षों के शोध के पश्चात दो बडे़ विद्वान वैदिक ऋषियों के विषय में यह कहते हैं- लिलियन सिल्बर्न के अनुसार, वैदिक ऋषि की दृष्टि में तात्कालिक, आदिकालीन के अनंत, अनेक रूपाकार वाले, जटिल पहलू हैं. दिन के बाद दिन आने की कोई गारंटी नहीं है और ब्रह्मांड की स्थिरता निरंतर ही पुन स्थापित की जानी है. वैदिक ब्रह्मांड, व्यवहार में क्षोभ, संकुचन और दबाव का दुख भरा ब्रह्मांड है, जो उद्गम के गहरे अंधेरे सागर की सी छवि लिए हुए है. वैदिक ऋषि के लिए कुछ भी निश्चित नहीं है. मानव जीवन या नहीं, सूर्योदय, या पानी का गिरना भी नहीं.  इस प्रकार ऋग्वेद की अधिकांश ऋचाएं एकाकी योजना के अनुरूप हैं. जिस ईश्वर का आह्वान किया जाता है उसे फिर बतलाया जाता है कि वह उसी कल्याणकारी, सहायक कार्य को करे, जो उसने बहुत पहले किसी ब्रह्मांडीय अथवा श्रेष्ठ बलिदानी व्यक्ति के लिए किया था और अंतिम ऋचाओं में उससे विनय की गई है कि वह उसी कार्य को अगले सूर्योदय के समय पुन करे, क्योंकि लोग सामान्यत उस क्षोभ से बचना, रक्षित होना चाहते हैं, जो रात्रि में किसी सहारे के अभाव में उन्हें घेर लेता है.

जेसी हीस्टरमैन के मुताबि़क, वैदिक चिंतन के लिए समूचा विश्व निरंतर दो ध्रुवों के बीच घूमता रहता था. जन्म और मृत्यु समग्रीकरण और विखंडन, आरोहण और अवरोहण के धु्र्वों के बीच जो अपनी अंतर्क्रिया द्वारा ब्रह्मांड में एक चक्रीय लय उत्पन्न करते हैं.
अंत में, यह कहना अतिश्योक्ति न होगा कि इस पुस्तक के बिना आपकी लाइब्रेरी अधूरी है.

समीक्ष्य कृति : कश का विनाश
लेखक : रॉबर्तो कलासो
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
पृष्ठ : 432
मूल्य : 600 रुपये
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ज्वलंत सवाल उठाता उपन्यास

फ़िरदौस ख़ान
दुनिया भर में महिलाओं को दोयम दर्जे पर रखा गया है. जन्म से लेकर मौत तक महिला कभी पिता पर, कभी पति पर और कभी अपने पुत्र पर निर्भर रही है. इसी निर्भरता की वजह से पुरुषों की नज़र में महिलाएं अबला और भोग्या बनकर रह गईं. लेकिन इतिहास गवाह है कि शिक्षित और आत्मनिर्भर महिलाओं ने पुरुषों के वर्चस्व से निकलकर ख़ुद अपनी अलग पहचान बनाई है. उषा प्रियंवदा का चर्चित उपन्यास शेष यात्रा भी एक ऐसी ही महिला की कहानी है, जो पति पर आश्रित है. यह उपन्यास 1984 में प्रकाशित हुआ था. तीन दशक बाद इसका दूसरा संस्करण प्रकाशित हुआ है. इस उपन्यास में एक ज्वलंत सवाल उठाया गया है कि क्या पुरुष पर आश्रित रहना ही नारी जीवन का यथार्थ है? पुरुष उसका अन्नदाता है, क्या सिर्फ़ इसीलिए उसे अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का हक़ नहीं है? उपन्यास में इस सवाल का जवाब भी दिया गया है कि नारी जीवन का यथार्थ उसका अपना स्वाभिमान और स्वावलंबन है. उपन्यास की नायिका अनुका यानी अनु एक छोटे से क़स्बे की लड़की है. पढ़ाई के दौरान ही अमेरिका में रहने वाले एक डाक्टर प्रणव से उसका विवाह हो जाता है. पति उसे हर सुख-सुविधा का सामान देता है, जिसके कारण वह हमेशा अपने भाग्य को सराहती है और पति के प्रति नतमस्तक रहती है. वह ख़ुद को पति के अनुरूप ढालने की कोशिश करती है. उसके लिए उसका पति और उसका घर ही उसकी दुनिया है. पति और घर के अलावा किसी और चीज़ के बारे में वह कभी सोचती तक नहीं है. जो ज़िम्मेदारी प्रणव ने उसे पकड़ाई थी, जो भूमिका दी गई थी, वह निभा रही थी. खाना बनाना, घर साफ़-सुथरा रखना,
प्रणव की पोज़िशन के अनुसार कपड़े पहनना, पार्टियों में चुपचाप मुस्कराते रहना. पहले यह सब उसे बहुत अच्छा लगता था, मगर जल्द ही वह पुरुष सत्ता की वास्तविकता को समझ जाती है, क्योंकि वक़्त के साथ-साथ प्रणव बदलने लगा. पहले तो वह देर से घर आने लगा और बाद में कई-कई दिन तक शहर से बाहर रहने लगा. इस दौरान अनु ने महसूस किया कि उसे शिफ़ौन की जगह रेशम अच्छा लगता है. नारंगी और पीले रंग की जगह बैंगनी और हरे रंग. फूल पत्ती के छापे की जगह ज्यामिति रेखाएं. लेकिन वह तो हमेशा ही पति की पसंद के अनुसार कपड़े पहनती आई है. प्रणव ने कभी उसकी पसंद-नापसंद जानने की कोशिश ही नहीं की. वह अपने लिए ऐसी पत्नी चाहता था, जिसकी अपनी कोई इच्छा न हो, वह बस एक यंत्र की तरह प्रणव के कहने पर उसके आदेश का पालन करती रहे. अनु के रूप में उसे ऐसी पत्नी मिल भी गई, लेकिन जल्द ही प्रणव का उससे मन भर गया. अब उसे कामकाजी पत्नी चाहिए थी, जो उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सके.

बहरहाल, एक दिन अनु को ज्योतसना बेन से पता चलता है कि प्रणव शिकागो में एक महिला के साथ रहता है. शादी से पहले भी कई महिलाओं के साथ उसके संबंध रह चुके हैं और शादी के बाद भी वह अनेक महिलाओं के साथ संबंध बनाए हुए है. यानी वह शादी के बाद भी नहीं सुधरा. यह सब जानकर अनु बुरी तरह टूट जाती है. उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है. इसलिए कुछ वक़्त तक उसे पागलख़ाने में भी रहना पड़ा. मानसिक स्थिति ठीक होने पर वह घर लौट आती है. वह प्रणव से इस बारे में बात करना चाहती है, तो वह उससे साफ़-साफ़ कह देता है कि वह अब उसके साथ और नहीं रह सकता. इसलिए बेहतर है कि दोनों अपने-अपने रास्ते चुन लें. वह प्रणव को मनाने की बहुत कोशिश करती है, लेकिन वह नहीं मानता. आख़िरकार दोनों अलग हो जाते हैं. अनु की दुनिया उजड़ जाती है. उसे अपने चारों तरफ़ अंधेरा ही अंधेरा नज़र आता है. उसे कहीं कोई अपना नज़र नहीं आता. वह अपने ननिहाल लौटना नहीं चाहती, क्योंकि वह जानती है कि समाज उसे चैन से जीने नहें देगा. उसे बहुत-सी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. लेकिन वह हार नहीं मानती और डाक्टरी की पढ़ाई शुरू कर देती है. वह अपनी सहेली दिव्या के भाई दीपांकर से विवाह कर लेती है. दीपांकर भी डाक्टर है, लेकिन वह प्रणव जैसा नहीं है. वह डाक्टर बन जाती है. उसकी एक बेटी होती है. अब उसका अपना भरा पूरा परिवार है. दीपांकर के साथ वह स्वावलंबन का जीवन जीती है.

बेशक, महिला जब तब तक ही कमज़ोर है, जब तक वह ख़ुद को कमज़ोर समझती है. अगर वह हिम्मत के साथ हालात का सामना करे, तो यक़ीनन जीत उसी की होगी. यह उपन्यास नारी-विमर्श की बहस के दौरान उठाए जाने वाले सवालों के जवाब देता नज़र आता है.

समीक्ष्य कृति : शेष यात्रा
लेखिका : उषा प्रियम्वदा
प्रकाशक : राजकमल प्रकाशन
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राहुल गांधी को समर्पित एक गीत

हमने कांग्रेस पर एक गीत लिखा है. हमने ये गीत कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को समर्पित किया है.
कांग्रेस गीत
कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस
देश की यही है आन
देश की यही है बान
देश की यही है शान
देश की यही है जान
कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस

ये अवाम की हिताय
ये अवाम की सुखाय
ये सभी के काम आये
ये सभी के मन को भाये
कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस कांग्रेस
-फ़िरदौस ख़ान

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कविता संग्रह, जो वाक़ई ख़ास है

फ़िरदौस ख़ान
कविता अभिव्यक्ति का ऐसा माध्यम है, जिसके द्वारा मन की भावनाओं को सुंदरता से व्यक्त किया जाता है.  आचार्य रामचंद्र शुक्ल के शब्दों में, हृदय की मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं. हज़ारी प्रसाद द्विवेदी के मतानुसार कविता का लोक प्रचलित अर्थ वह वाक्य है, जिसमें भावावेश हो, कल्पना हो, लालित्य हो, पद हो तथा प्रयोजन की सीमा समाप्त हो चुकी है. दरअसल, कविता में भाव तत्व की प्रधानता होती है. रस को कविता की आत्मा माना जाता है. कविता के अवयवों में आज भी इसकी जगह सबसे अहम है. प्राचीनकाल में कविता में छंद और अलंकारों को महत्वपूर्ण माना गया था, लेकिन आधुनिक काल में कविताएं छंद और अलंकारों से मुक्त हो गईं. कविताओं में छंदों और अलंकारों की अनिवार्यता ख़त्म हो गई और नई कविता का चलन शुरू हुआ. इस तरह मुक्त छंद या छंदहीन कविताओं की नदियां बहने लगीं.  मुक्तछंद कविताओं में पद की ज़रूरत नहीं होती, सिर्फ़ एक भाव प्रधान तत्व रहता है. आज की कविता में मनुष्य के मन में हिलोरें लेने वाली भावनाएं, उसके मस्तिष्क में उठने वाले विचार, कल्पनाएं और अनुभव प्रभावी हो गए और चंछ लुप्त हो गए. हां, इन कविताओं में एक लय होती है, भावों की लय, जो पाठक को बांधे रखती है.

कवि चेतन कश्यप की कविताएं भाव प्रधान कविताएं हैं. पिछले दिनों जयपुर के बोधि प्रकाशन ने उनका
काव्य संग्रह ’ख़ास तुम्हारे लिए’ प्रकाशित किया है. जितना दिलकश काव्य संग्रह का नाम है, इसमें शामिल कविताएं भी उतनी ही दिलकश हैं. 88 पृष्ठों के इस कविता संग्रह में दो खंड है. पहले खंड का नाम ’सफ़र-हमसफ़र है, जिसमें 27 कविताएं हैं. दूसरे खंड का नाम इसी पुस्तक के नाम पर है यानी ’ख़ास तुम्हारे लिए’ और इसमें 42 कविताओं को शामिल किया गया है. इन कविताओं में प्रेम है, वियोग है, मिलन की अभिलाषा है, टूटन है, बिखराव है और दरकते रिश्तों का दर्द है. और इस सबके साथ ही उम्मीद की एक ऐसी किरण भी है, जो ज़िन्दगी के अंधेरे को मिटाने देने के लिए आतुर नज़र आती है. रौशनी की एक ऐसी चाह है, जो हर तरफ़ उजाला बनकर बिखर जाना चाहती है. कविताएं प्रेयसी को संबोधित करती हैं, कवि के हृदय से निकली भावावेश की नदी में प्रेयसी को बहा ले जाना चाहती हैं. ऐसी ही एक कविता है-
साजो-सामन से
सज तो गया है
घर
तुम
आओ
रहो
तो प्राण प्रतिष्ठा भी हो जाए...

काव्य सृजन के मामले में भी काव्य संग्रह उत्कृष्ट है. कविता की भाषा में प्रवाह है, एक लय है. कवि ने कम से कम शब्दों में प्रवाहपूर्ण सारगर्भित बात कही है. कविताओं में शिल्प सौंदर्य है. कवि को अच्छे से मालूम है कि उसे अपनी भावनाओं को किन शब्दों में और किन बिम्बों के माध्यम से प्रकट करना है. और यही बिम्ब विधान पाठक को स्थायित्व प्रदान करते हैं. कविता में चिंतन और विचारों को सहज सौर सरल तरीके से पेश किया गया है, जिससे कविता का अर्थ पाठक को सहजता से समझ आ जाता है. पुस्तक का आवरण भी आकर्षक है. काव्य प्रेमियों के लिए यह एक अच्छा कविता संग्रह है.

समीक्ष्य कृति : ख़ास तुम्हारे लिए
कवि : चेतन कश्यप
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
पेज : 88
मूल्य : 100 रुपये
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सिर्फ़ तुम...

मौलाना जलालुद्दीन रूमी को एक औरत से मुहब्बत हो गई. वे अपनी महबूबा के घर गए और दरवाज़े पर दस्तक दी. अदर से एक औरत की आवाज़ आई- कौन है?
मौलाना रूमी ने जवाब दिया- मैं हूं. रूमी, तुम्हारा आशिक़...
लेकिन कोई जवाब नहीं आया... मौलाना रूमी दरवाज़ा खोलने की इल्तिजा करते रहे... लेकिन दरवाज़ा नहीं खुला और न ही अंदर से कोई आवाज़ आई.
कई रोज़ तक ये सिलसिला चलता रहा. मौलाना रूमी अपने होश-हवास खो बैठे. और दर-ब-दर भटकते फिरते रहे. कुछ अरसे बाद वे फिर अपनी महबूबा के घर गए और दरवाज़े पर फिर से दस्तक दी. अंदर से आवाज़ आई- कौन है ?
मौलाना रूमी ने जवाब दिया- तुम, सिर्फ़ तुम.रूमी अब कहीं नहीं, हर तरफ़ सिर्फ़ तुम ही तुम हो.
दरवाज़ा खुल गया और मौलाना रूमी को अंदर बुला लिया गया.

इसी को इश्क़ कहते हैं... इश्क़ में सिर्फ़ महबूब होता है और कोई नहीं...
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हां, तुम मुझे यूं भुला न पाओगे


फ़िरदौस ख़ान
बहुमुखी संगीत प्रतिभा के धनी मोहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसंबर, 1924 को पंजाब के अमृतसर ज़िले के गांव मजीठा में हुआ. संगीत प्रेमियों के लिए यह गांव किसी तीर्थ से कम नहीं है. मोहम्मद रफ़ी के चाहने वाले दुनिया भर में हैं. भले ही मोहम्मद रफ़ी साहब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ रहती दुनिया तक क़ायम रहेगी. साची प्रकाशन द्वारा प्रकाशित विनोद विप्लव की किताब मोहम्मद रफ़ी की सुर यात्रा मेरी आवाज़ सुनो मोहम्मद रफ़ी साहब के जीवन और उनके गीतों पर केंद्रित है. लेखक का कहना है कि मोहम्मद रफ़ी के विविध आयामी गायन एवं व्यक्तित्व को किसी पुस्तक में समेटना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव है, फिर भी अगर संगीत प्रेमियों को इस पुस्तक को पढ़कर मोहम्मद रफ़ी के बारे में जानने की प्यास थोड़ी-सी भी बुझ जाए तो मैं अपनी मेहनत सफल समझूंगा. इस लिहाज़ से यह एक बेहतरीन किताब कही जा सकती है.

मोहम्मद ऱफी के पिता का नाम हाजी अली मोहम्मद और माता का नाम अल्लारखी था. उनके पिता ख़ानसामा थे. रफ़ी के बड़े भाई मोहम्मद दीन की हजामत की दुकान थी, जहां उनके बचपन का काफ़ी वक़्त गुज़रा. वह जब क़रीब सात साल के थे, तभी उनके बड़े भाई ने इकतारा बजाते और गीत गाते चल रहे एक फ़क़ीर के पीछे-पीछे उन्हें गाते देखा. यह बात जब उनके पिता तक पहुंची तो उन्हें काफ़ी डांट पड़ी. कहा जाता है कि उस फ़क़ीर ने रफ़ी को आशीर्वाद दिया था कि वह आगे चलकर ख़ूब नाम कमाएगा. एक दिन दुकान पर आए कुछ लोगों ने ऱफी को फ़क़ीर के गीत को गाते सुना. वह उस गीत को इस क़दर सधे हुए सुर में गा रहे थे कि वे लोग हैरान रह गए. ऱफी के बड़े भाई ने उनकी प्रतिभा को पहचाना. 1935 में उनके पिता रोज़गार के सिलसिले में लाहौर आ गए. यहां उनके भाई ने उन्हें गायक उस्ताद उस्मान ख़ान अब्दुल वहीद ख़ान की शार्गिदी में सौंप दिया. बाद में रफ़ी ने पंडित जीवन लाल और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां जैसे शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों से भी संगीत सीखा.

मोहम्मद रफ़ी उस वक़्त के मशहूर गायक और अभिनेता कुंदन लाल सहगल के दीवाने से और उनके जैसा ही बनना चाहते थे. वह छोटे-मोटे जलसों में सहगल के गीत गाते थे. क़रीब 15 साल की उम्र में उनकी मुलाक़ात सहगल से हुई. हुआ यूं कि एक दिन लाहौर के एक समारोह में सहगल गाने वाले थे. रफ़ी भी अपने भाई के साथ वहां पहुंच गए. संयोग से माइक ख़राब हो गया और लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया. व्यवस्थापक परेशान थे कि लोगों को कैसे ख़ामोश कराया जाए. उसी वक़्त रफ़ी के बड़े भाई व्यवस्थापक के पास गए और उनसे अनुरोध किया कि माइक ठीक होने तक रफ़ी को गाने का मौक़ा दिया जाए. मजबूरन व्यवस्थापक मान गए. रफ़ी ने गाना शुरू किया, लोग शांत हो गए. इतने में सहगल भी वहां पहुंच गए. उन्होंने रफ़ी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि एक दिन तुम्हारी आवाज़ दूर-दूर तक फैलेगी. बाद में रफ़ी को संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी के मार्गदर्शन में लाहौर रेडियो में गाने का मौक़ा मिला. उन्हें कामयाबी मिली और वह लाहौर फ़िल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने की कोशिश करने लगे. उस दौरान उनकी रिश्ते में बड़ी बहन लगने वाली बशीरन से उनकी शादी हो गई. उस वक़्त के मशहूर संगीतकार श्याम सुंदर और फ़िल्म निर्माता अभिनेता नासिर ख़ान से रफ़ी की मुलाक़ात हुई. उन्होंने उनके गाने सुने और उन्हें बंबई आने का न्यौता दिया. ऱफी के पिता संगीत को इस्लाम विरोधी मानते थे, इसलिए बड़ी मुश्किल से वह संगीत को पेशा बनाने पर राज़ी हुए. रफ़ी अपने भाई के साथ बंबई पहुंचे. अपने वादे के मुताबिक़ श्याम सुंदर ने रफ़ी को पंजाबी फ़िल्म गुलबलोच में ज़ीनत के साथ गाने का मौक़ा दिया. यह 1944 की बात है. इस तरह रफ़ी ने गुलबलोच के सोनियेनी, हीरिएनी तेरी याद ने बहुत सताया गीत के ज़रिये पार्श्वगायन के क्षेत्र में क़दम रखा. रफ़ी ने नौशाद साहब से भी मुलाक़ात की. नौशाद ने फ़िल्म शाहजहां के एक गीत में उन्हें सहगल के साथ गाने का मौक़ा दिया. रफ़ी को सिर्फ़ दो पंक्तियां गानी थीं-मेरे सपनों की रानी, रूही, रूही रूही. इसके बाद नौशाद ने 1946 में उनसे फ़िल्म अनमोल घड़ी का गीत तेरा खिलौना टूटा बालक, तेरा खिलौना टूटा रिकॉर्ड कराया. फिर 1947 में फ़िरोज़ निज़ामी ने रफ़ी को फ़िल्म जुगनूं का युगल गीत नूरजहां के साथ गाने का मौक़ा दिया. बोल थे- यहां बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है. यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ. इसके बाद नौशाद ने रफ़ी से फ़िल्म मेला का एक गीत ये ज़िंदगी के मेले गवाया. इस फ़िल्म के बाक़ी गीत मुकेश से गवाये गए, लेकिन रफ़ी का गीत अमर हो गया. यह गीत हिंदी सिनेमा के बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है. इस बीच रफ़ी संगीतकारों की पहली जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम के संपर्क में आए. इस जोड़ी ने अपनी शुरुआती फ़िल्मों प्यार की जीत, बड़ी बहन और मीना बाज़ार में रफ़ी की आवाज़ का भरपूर इस्तेमाल किया. इसके बाद तो नौशाद को भी फ़िल्म दिल्लगी में नायक की भूमिका निभा रहे श्याम कुमार के लिए रफ़ी की आवाज़ का ही इस्तेमाल करना पड़ा. इसके बाद फ़िल्म चांदनी रात में भी उन्होंने रफ़ी को मौक़ा दिया. बैजू बावरा संगीत इतिहास की सिरमौर फ़िल्म मानी जाती है. इस फ़िल्म ने रफ़ी को कामयाबी के आसमान तक पहुंचा दिया. इस फ़िल्म में प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खां साहब और डी वी पलुस्कर ने भी गीत गाये थे. फ़िल्म के पोस्टरों में भी इन्हीं गायकों के नाम प्रचारित किए गए, लेकिन जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो मोहम्मद रफ़ी के गाये गीत तू गंगा की मौज और ओ दुनिया के रखवाले हर तरफ़ गूंजने लगे. रफ़ी ने अपने समकालीन गायकों तलत महमूद, मुकेश और सहगल के रहते अपने लिए जगह बनाई. रफ़ी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने तक़रीबन 26 हज़ार गाने गाये, लेकिन उनके तक़रीबन पांच हज़ार गानों के प्रमाण मिलते हैं, जिनमें ग़ैर फ़िल्मी गीत भी शामिल हैं. देश विभाजन के बाद जब नूरजहां, फ़िरोज़ निज़ामी और निसार वाज्मी जैसी कई हस्तियां पाकिस्तान चली गईं, लेकिन वह हिंदुस्तान में ही रहे. इतना ही नहीं, उन्होंने सभी गायकों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा देशप्रेम के गीत गाये. रफ़ी ने जनवरी, 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के एक माह बाद गांधी जी को श्रद्धांजलि देने के लिए हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में राजेंद्र कृष्ण रचित सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी गीत गाया तो पंडित जवाहर लाल नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे. भारत-पाक युद्ध के वक़्त भी रफ़ी ने जोशीले गीत गाये. यह सब पाकिस्तानी सरकार को पसंद नहीं था. शायद इसलिए दुनिया भर में अपने कार्यक्रम करने वाले रफ़ी पाकिस्तान में शो पेश नहीं कर पाए. ऱफी किसी भी तरह के गीत गाने की योग्यता रखते थे. संगीतकार जानते थे कि आवाज़ को तीसरे सप्तक तक उठाने का काम केवल ऱफी ही कर सकते थे. मोहम्मद रफ़ी ने संगीत के उस शिखर को हासिल किया, जहां तक कोई दूसरा गायक नहीं पहुंच पाया. उनकी आवाज़ के आयामों की कोई सीमा नहीं थी. मद्धिम अष्टम स्वर वाले गीत हों या बुलंद आवाज़ वाले याहू शैली के गीत, वह हर तरह के गीत गाने में माहिर थे. उन्होंने भजन, ग़ज़ल, क़व्वाली, दशभक्ति गीत, दर्दभरे तराने, जोशीले गीत, हर उम्र, हर वर्ग और हर रुचि के लोगों को अपनी आवाज़ के जादू में बांधा. उनकी असीमित गायन क्षमता का आलम यह था कि उन्होंने रागिनी, बाग़ी, शहज़ादा और शरारत जैसी फ़िल्मों में अभिनेता-गायक किशोर कुमार पर फ़िल्माये गीत गाये.

वह 1955 से 1965 के दौरान अपने करियर के शिखर पर थे. यह वह व़क्त था, जिसे हिंदी फ़िल्म संगीत का स्वर्ण युग कहा जा सकता है. उनकी आवाज़ के जादू को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है. उनकी आवाज़ में सुरों को महसूस किया जा सकता है. उन्होंने अपने 35 साल के फ़िल्म संगीत के करियर में नौशाद, सचिन देव बर्मन, सी रामचंद्र, रोशन, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, ओ पी नैयर, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, सलिल चौधरी, रवींद्र जैन, इक़बाल क़ुरैशी, हुस्नलाल, श्याम सुंदर, फ़िरोज़ निज़ामी, हंसलाल, भगतराम, आदि नारायण राव, हंसराज बहल, ग़ुलाम हैदर, बाबुल, जी एस कोहली, वसंत देसाई, एस एन त्रिपाठी, सज्जाद हुसैन, सरदार मलिक, पंडित रविशंकर, उस्ताद अल्ला रखा, ए आर क़ुरैशी, लच्छीराम, दत्ताराम, एन दत्ता, सी अर्जुन, रामलाल, सपन जगमोहन, श्याम जी-घनश्यामजी, गणेश, सोनिक-ओमी, शंभू सेन, पांडुरंग दीक्षित, वनराज भाटिया, जुगलकिशोर-तलक, उषा खन्ना, बप्पी लाह़िडी, राम-लक्ष्मण, रवि, राहुल देव बर्मन और अनु मलिक जैसे संगीतकारों के साथ मिलकर संगीत का जादू बिखेरा.

रफ़ी साहब ने 31 जुलाई, 1980 को आख़िरी सांस ली. उन्हें दिल का दौरा पड़ा था. जिस रोज़ उन्हें जुहू के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया, उस दिन बारिश भी बहुत हो रही थी. उनके चाहने वालों ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी. लग रहा था मानो रफ़ी साहब कह रहे हों-
हां, तुम मुझे यूं भुला न पाओगे
जब कभी भी सुनोगे गीते मेरे
संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे… (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

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तुम कब आओगे सांता...

फ़िरदौस ख़ान
क्रिसमस है... साल भर बेसब्री से इंतज़ार करते हैं इस बड़े दिन का... बहुत ख़ूबसूरत यादें जुड़ी हैं क्रिसमस से... बचपन से ही यह त्यौहार बहुत अच्छा लगता है... गुज़रते वक़्त के साथ इस त्यौहार से एक गहरा रिश्ता जुड़ गया... वो कहीं भी हों, इस दिन चर्च ज़रूर जाते हैं...
बचपन से सुनते आए हैं कि क्रिसमस के दिन सांता क्लाज आते हैं. अपने साथ बहुत सारे तोहफ़े और खुशियां लाते हैं. बचपन में बस संता क्लॊज़ को देखने की ख़्वाहिश थी. उनसे कुछ पाने का ख़्याल कभी ज़हन में आया तक नहीं, क्योंकि हर चीज़ मुहैया थी. जिस चीज़ की तरफ़ इशारा कर दिया कुछ ही पलों में मिल जाती थी. किसी चीज़ का अभाव किया होता है. कभी जाना ही नहीं. मगर अब सांता क्लाज़ से पाना चाहते हैं- मुहब्बत, पूरी कायनात के लिए, ताकि हर तरफ़ बस मुहब्बत का उजियारा हो और नफ़रतों का अंधेरा हमेशा के लिए छंट जाए... हर इंसान ख़ुशहाल हो, सबका अपना घरबार हो, सबकी ज़िन्दगी में चैन-सुकून हो, आमीन.. संता क्लॊज़ वही हैं, मगर उम्र बढ़ने के साथ ख़्वाहिशें भी बढ़ जाती हैं...

दुनियाभर में मनाए जाने वाले क्रिसमस की दास्तां बहुत ही रोचक है. क्रिसमस ईसाइयों के सबसे ख़ास त्यौहारों में से एक है. इसे ईसा मसीह के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाता है. क्रिसमस को बड़े दिन के रूप में भी मनाया जाता है. क्रिसमस से 12 दिन का उत्सव क्रिसमस टाइड शुरू होता है. ‘क्रिसमस’ शब्द ‘क्राइस्ट्स और मास’ दो शब्दों से मिलकर बना है, जो मध्य काल के अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेमसे’ और पुरानी अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेसमैसे’ से नक़ल किया गया है. 1038 ईस्वी से इसे ‘क्रिसमस’ कहा जाने लगा. इसमें ‘क्रिस’ का अर्थ ईसा मसीह और ‘मस’ का अर्थ ईसाइयों का प्रार्थनामय समूह या ‘मास’ है. सोलहवीं सदी के मध्य से ‘क्राइस्ट’ शब्द को रोमन अक्षर एक्स से दर्शाने की प्रथा चल पड़ी. इसलिए अब क्रिसमस को एक्समस भी कहा जाता है.
भारत सहित दुनिया के ज़्यादातर देशों में क्रिसमस 25 दिसम्बर को मनाया जाता है, क्योंकि इन हिस्सों में 1582 में पोप ग्रेगोरी द्वारा बनाए गए कैलेंडर का इस्तेमाल होता है. इसके हिसाब से 25 दिसम्बर को ही क्रिसमस आता है, लेकिन रूस, मिस्त्र, अरमेनिया, इथोपिया, गॉर्गिया, युक्रेन, जार्जिया, सर्बिया और कजाकिस्तान आदि देशों में लोग 7 जनवरी को क्रिसमस मनाते हैं, क्योंकि पारंपरिक जुलियन कैलेंडर का 25 दिसम्बर यानी क्रिसमस का दिन गेगोरियन कैलेंडर और रोमन कैलेंडर के मुताबिक़ 7 जनवरी को आता है. क़ाबिले-ग़ौर है कि इटली में 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया जाता है. यहां 'द फ़ीस्ट ऑफ़ एपिफ़ेनी' नाम से इसे मनाया जाता है. माना जाता है कि यीशू के पैदा होने के बारहवें दिन तीन आलिम उन्हें तोहफ़े और दुआएं देने आए थे.

हालांकि पवित्र बाइबल में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं है कि क्रिसमस मनाने की परम्परा आख़िर कैसे, कब और कहां शुरू हुई. एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म 7 से 2 ईसा पूर्व के बीच हुआ था. 25 दिसम्बर यीशु मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्म तिथि नहीं है. शोधकर्ताओं का कहना है कि ईसा मसीह के जन्म की सही तारीख़ के बारे में पता लगाना काफ़ी मुश्किल है. सबसे पहले रोम के बिशप लिबेरियुस ने ईसाई सदस्यों के साथ मिलकर 354 ईस्वी में 25 दिसम्बर को क्रिसमस मनाया था. उसके बाद 432 ईस्वी में मिस्र में पुराने जुलियन कैलेंडर के मुताबिक़ 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया गया था. उसके बाद धीरे-धीरे पूरी दुनिया में जहां भी ईसाइयों की तादाद ज़्यादा थी, यह त्यौहार मनाया जाने लगा. छठी सदी के आख़िर तक इंग्लैंड में यह एक परम्परा का रूप ले चुका था.

ग़ौरतलब है ईसा मसीह के जन्म के बारे में व्यापिक स्वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा के मुताबिक़ प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा. गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्म देगी और बच्चे् का नाम जीसस रखा जाएगा. वह बड़ा होकर राजा बनेगा, और उसके राज्य की कोई सीमा नहीं होगी. देवदूत गैब्रियल, जोसफ़ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्चे को जन्म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे और उसका परित्याग न करे. जिस रात को जीसस का जन्म  हुआ, उस वक़्त लागू नियमों के मुताबिक़ अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ़ बेथलेहेम जाने के लिए रास्ते में थे. उन्होंने एक अस्तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्म दिया और उसे एक नांद में लिटा दिया. इस प्रकार जीसस का जन्म हुआ. क्रिसमस समारोह आधी रात के बाद शुरू होता है. इसके बाद मनोरंजन किया जाता है. ख़ूबसूरत रंगीन लिबास पहने बच्चे ड्रम्स, झांझ-मंजीरों के आर्केस्ट्रा के साथ हाथ में चमकीली छड़ियां लिए हुए सामूहिक नृत्यु करते हैं.

क्रिसमस का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि ईसा मसीह के जन्म की कहानी का संता क्लॉज़ की कहानी के साथ कोई रिश्ता नहीं है. वैसे तो संता क्लॉज़ को याद करने का चलन चौथी सदी से शुरू हुआ था और वे संत निकोलस थे, जो तुर्किस्तान के मीरा नामक शहर के बिशप थे. उन्हें बच्चों से बहुत प्यार था और वे ग़रीब, अनाथ और बेसहारा बच्चों को तोहफ़े दिया करते थे.
पुरानी कैथोलिक परंपरा के मुताबिक़ क्रिसमस की रात को ईसाई बच्चे अपनी तमन्नाओं और ज़रूरतों को एक पत्र में लिखकर सोने से पूर्व अपने घर की खिड़कियों में रख देते थे. यह पत्र बालक ईसा मसीह के नाम लिखा जाता था. यह मान्यता थी कि फ़रिश्ते उनके पत्रों को बालक ईसा मसीह तक पहुंचा देंगे. क्रिसमस ट्री की कहानी भी बहुत ही रोचक है. किवदंती है कि सर्दियों के महीने में एक लड़का जंगल में अकेला भटक रहा था. वह सर्दी से ठिठुर रहा था. वह ठंड से बचने के लिए आसरा तलाशने लगा. तभी उसकी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी. वह झोपडी के पास गया और उसने दरवाजा खटखटाया. कुछ देर बाद एक लकड़हारे ने दरवाज़ा खोला. लड़के ने उस लकड़हारे से झोपड़ी के भीतर आने का अनुरोध किया. जब लकड़हारे ने ठंड में कांपते उस लड़के को देखा, तो उसे लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे अपनी झोपड़ी में बुला लिया और उसे गर्म कपड़े भी दिए. उसके पास जो रूख-सूखा था, उसने लड़के को बभी खिलाया. इस अतिथि सत्कार से लड़का बहुत ख़ुश हुआ. हक़ीक़त में वह लड़का एक फ़रिश्ता था और लकड़हारे का इम्तिहान लेने आया था. उसने लकड़हारे के घर के पास खड़े फ़र के पेड़ से एक तिनका निकाला और लकड़हारे को देकर कहा कि इसे ज़मीन में बो दो. लकड़हारे ने ठीक वैसा ही किया जैसा लड़के ने बताया था. लकड़हारा और उसकी पत्नी इस पौधे की देखभाल करने लगे. एक साल बाद क्रिसमस के दिन उस पेड़ में फल लग गए. फलों को देखकर लकड़हारा और उसकी पत्नी हैरान रह गए, क्योंकि ये फल, साधारण फल नहीं थे बल्कि सोने और चांदी के थे. कहा जाता है कि इस पेड़ की याद में आज भी क्रिसमस ट्री सजाया जाता है. मगर मॉडर्न क्रिसमस ट्री की शुरुआत जर्मनी में हुई. उस वक़्त एडम और ईव के नाटक में स्टेज पर फ़र के पेड़ लगाए जाते थे. इस पर सेब लटके होते थे और स्टेज पर एक पिरामिड भी रखा जाता था. इस पिरामिड को हरे पत्तों और रंग-बिरंगी मोमबत्तियों से सजाया जाता था. पेड़ के ऊपर एक चमकता तारा लगाया जाता था. बाद में सोलहवीं सदी में फ़र का पेड़ और पिरामिड एक हो गए और इसका नाम हो गया क्रिसमस ट्री. अट्ठारहवीं सदी तक क्रिसमस ट्री बेहद लोकप्रिय हो चुका था. जर्मनी के राजकुमार अल्बर्ट की पत्नी महारानी विक्टोरिया के देश इंग्लैंड में भी धीरे-धीरे यह लोकप्रिय होने लगा. इंग्लैंड के लोगों ने क्रिसमस ट्री को रिबन से सजाकर और आकर्षक बना दिया. उन्नीसवीं सदी तक क्रिसमस ट्री उत्तरी अमेरिका तक जा पहुंचा और वहां से यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया. क्रिसमस के मौक़े पर अन्य त्यौहारों की तरह अपने घर में तैयार की हुई मिठाइयां और व्यंजनों को आपस में बांटने और क्रिसमस के नाम से तोहफ़े देने की परम्परा भी काफ़ी पुरानी है. इसके अलावा बालक ईसा मसीह के जन्म की कहानी के आधार पर बेथलेहम शहर के एक गौशाला की चरनी में लेटे बालक ईसा मसीह और गाय-बैलों की मूर्तियों के साथ पहाड़ों के ऊपर फ़रिश्तों और चमकते तारों को सजा कर झांकियां बनाई जाती हैं, जो तक़रीबन दो हज़ार साल पुरानी ईसा मसीह के जन्म की याद दिलाती हैं.

दिसम्बर का महीना शुरू होते ही दुनियाभर में क्रिसमस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं . गिरजाघरों को सजाया जाता है. भारत में अन्य मज़हबों के लोग भी क्रिसमस के जश्न में शामिल होते हैं. क्रिसमस के दौरान प्रभु की प्रशंसा में लोग कैरोल गाते हैं. वे प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं. भारत में ख़ासकर गोवा में कुछ लोकप्रिय चर्च हैं, जहां क्रिसमस बहुत उत्साह के साथ मनाया जाता है. इनमें से ज़्यादातर चर्च ब्रि‍टिश और पुर्तगाली शासन के दौरान बनाए गए थे. इनके अलावा देश के कुछ बड़े चर्चों मे सेंट जोसफ़ कैथेड्रिल, आंध्र प्रदेश का मेढक चर्च, सेंट कै‍थेड्रल, चर्च ऑफ़ सेंट फ्रांसिस ऑफ़ आसीसि और गोवा का बैसिलिका व बोर्न जीसस, सेंट जॊन्स चर्च इन विल्डरनेस और हिमाचल में क्राइस्ट  चर्च, सांता क्लॊज बैसिलिका चर्च, और केरल का सेंट फ्रासिस चर्च, होली क्राइस्ट चर्च, महाराष्ट्र में माउन्टल मैरी चर्च, तमिलनाडु में क्राइस्ट द किंग चर्च व वेलान्कन्नी चर्च, और आल सेंट्स चर्च और उत्तर प्रदेश का कानपुर मेमोरियल चर्च शामिल हैं. क्रिसमस पर देश भर के सभी छोटे-बड़े चर्चों में रौनक़ रहती है. यह हमारे देश की सदियों पुरानी परंपरा रही है कि यहां सभी त्यौहारों को मिलजुल कर मनाया जाता है. हर त्यौहार का अपना ही उत्साह होता है- बिलकुल ईद और दिवाली की तरह. 
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राहुल गांधी को भी ज़िन्दगी जीने का हक़ है

फ़िरदौस ख़ान
राहुल गांधी भी औरों की तरह ही इंसान हैं. वे कोई बेजान मूरत नहीं हैं, जिसके अपने कोई जज़्बात न हों, अहसासात न हों, ख़्वाहिशात न हों. उनके भी अपने सुख-दुख हैं. उन्हें भी ज़िन्दगी जीने का पूरा हक़ है, ख़ुश रहने का हक़ है. जब इंसान परेशान होता है, दिल बोझल होता है, तो वह दिल बहलाने के सौ जतन करता है... कोई किताबें पढ़ता है, कोई गीत-संगीत सुनता है, कोई फ़िल्म देखता है, कोई घूमने निकल जाता है या इसी तरह का अपनी पसंद का कोई काम करता है.

ख़बरों के मुताबिक़ गुज़श्ता 18 दिसंबर की शाम को गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव नतीजे आने के बाद राहुल गांधी अपने क़रीबी दोस्तों के साथ हॉलीवुड फ़िल्म 'स्टार वॉर' देखने सिनेमा हॉल चले गए. लेकिन कुछ वक़्त बाद ही वे फ़िल्म बीच में छोड़कर वापस आ गए. कुछ लोगों ने उन्हें सिनेमा हॊल में देख लिया और फिर क्या था, भारतीय जनता पार्टी ने इसे एक बड़ा सियासी मुद्दा बना दिया.

भारतीय जनता पार्टी के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी की काम करने की क्षमता पर तंज़ कसते हुए कई ट्वीट्स किए. उन्होंने कहा, ‘कांग्रेस ने ना केवल गुजरात चुनाव हारा, बल्कि जहां पार्टी की सरकार थी, हिमाचल प्रदेश में, वहां भी हार गई, लेकिन राहुल गांधी इस बात का आंकलन ना करके फ़िल्म देखने निकल गए.’ एक के बाद एक ट्वीट कर अमित मालवीय ने राहुल से पूछा कि, 'अगर राहुल ने सिनेमा छोड़ गुजरात में ही पार्टी के प्रदर्शन का आंकलन किया होता, तो उन्हें पता चल जाता कि सौराष्ट्र जहां वह सबसे ज़्यादा सीटें जीते हैं, वहां भी बीजेपी को सबसे ज़्यादा वोट मिले हैं. यहां बीजेपी को 45.9 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि कांग्रेस को 45.5 प्रतिशत.

कहा जा रहा है कि जिस वक़्त प्रधानमंत्री दोनों राज्यों की जनता को संबोधित कर रहे थे, ठीक उसी वक़्त राहुल गांधी फ़िल्म का लुत्फ़ उठा रहे थे. दरअसल, उस वक़्त राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालत में बहुत फ़र्क़ था. कांग्रेस दोनों राज्यों में चुनाव हारी है, और उसने हिमाचल प्रदेश में अपनी हुकूमत भी गंवा दी. ऐसी हालत में उदास होना लाज़िमी है. भारतीय जनता पार्टी ने जहां गुजरात की अपनी सत्ता बचाई, वहीं हिमाचल प्रदेश भी उसकी झोली में आ गया. ऐसे में प्रधानमंत्री का ख़ुश होकर जनता को संबोधित करना कोई अनोखी और बड़ी बात नहीं है.
फ़र्ज़ करें कि अगर चुनाव नतीजे इससे बिल्कुल उलट होते. भारतीय जनता पार्टी गुजरात हार जाती और कांग्रेस हिमाचल प्रदेश बचाने के साथ ही गुजरात भी जीत जाती, तो उस वक़्त राहुल गांधी भी पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे होते, उनके साथ जश्न मना रहे होते.  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस वक़्त क्या करते, ये वही जानें और भारतीय जनता पार्टी वाले जानें.

बहरहाल, राहुल गांधी की ज़ाती ज़िन्दगी में दख़ल देने का किसी को कोई हक़ नहीं है.
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