जिस्म की ख़्वाहिशों पर रिवायतों के पहरे हैं...


जिस्म की
ख़्वाहिशों पर
रिवायतों के पहरे हैं...

इसलिए
अज़ल से अबद तक
चलती रहती है
जिस्म और ज़मीर की जंग...

जिस्म को वास्ता है
फ़क़्त
नफ़्स की तमाम
ख़्वाहिशों को पूरा करने से...

लेकिन
ज़मीर को
लुत्फ़ आता है
हर  ख़्वाहिश  को
मिटाने में...
शायद
यही ज़मीर की
फ़ितरत है...

जिस्म शैतान
तो
ज़मीर फ़रिश्तों से
मुतासिर है...

मगर
इंसान तो
बस इंसान है...

वह न तो मुकम्मल
शैतान है
और न ही
फ़रिश्तों जैसा...

शायद इसलिए
उम्रभर
चलती रहती है
जिस्म और ज़मीर की जंग...
-फ़िरदौस ख़ान

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ये लखनऊ की सरज़मीं ...




-फ़िरदौस ख़ान
लखनऊ कई बार आना हुआ. पहले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान...और फिर यहां समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद. हमें दावत दी गई थी कि हम अखिलेश यादव की ताजपोशी के मौक़े पर मौजूद रहें और जश्न में भी शिरकत करें. बहरहाल, एक सुबह हमने दिल्ली से लखनऊ के लिए उड़ान भरी और क़रीब एक घंटे बाद हम इस प्यारी धरती पर थे... हमारे पास वक़्त बहुत काम था, लेकिन काम बहुत ज़्यादा...अगले रोज़ हमें वापस दिल्ली पहुंचना था...इस दौरान हमने अपने काम निपटाए और फिर कुछ वक़्त निकालकर बाज़ार की राह पकड़ी...वाक़ई बहुत अच्छा है यह शहर...इतना अच्छा कि कोई भी यहां बस जाना चाहेगा... लखनऊ में बहुत अच्छा वक़्त गुज़रा...इतनी पुरख़ुलूस मेहमान नवाज़ी कि हम कभी इसे भूल ही नहीं पाएंगे... रहने के लिए शानदार जगह और घूमने के लिए महंगी गाड़ी... साथ में सुरक्षा गार्ड...लगा कि हम उत्तर प्रदेश सरकार की ही कोई वज़ीर हैं...हा हा हा...

नवाबों का शहर लखनऊ अपनी तहज़ीब के लिए जाना जाता है. इसे पूरब की स्वर्ण नगरी और शिराज-ए-हिन्द भी कहा जाता है. शहर के बीच से गोमती नदी बहती है. लखनऊ जिस इलाक़े में आता है, उसे अवध के नाम से जाना जाता है. लखनऊ प्राचीन कोसल राज्य का हिस्सा था. यह राम की विरासत थी, जिसे उन्होंने अपने छोटे भाई लक्ष्मण को सौंप दिया था. लक्ष्मण के नाम पर इसका नाम लक्ष्मणावती पड़ गया. बाद में इसे लक्ष्मणपुर कहा जाने लगा. इसके बाद इसे लखनपुर के नाम से जाना गया, जो बाद में बदल कर लखनऊ हो गया. यहां से अयोध्या भी महज़ 80 मील की दूरी पर है.

लखनऊ के बारे में एक और कहानी बताई जाती है, जिसके मुताबिक़ इस शहर का नाम लखन क़िले के कारीगर लखन अहीर के नाम पर रखा गया है. फ़िलहाल हम जिस लखनऊ को देख रहे हैं, जान रहे हैं, उसकी बुनियाद अवध के नवाब आसफ़-उद्दौला ने 1775 में रखी थी. वह  अवध के नवाब शुजाउद्दौला के बेटे थे. अवध के शासकों ने लखनऊ को अपनी राजधानी बनाकर इसे समृद्ध किया,  लेकिन बाद के नवाबों ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया. नतीजा यह हुआ कि लॉर्ड डलहौज़ी ने अवध पर क़ब्ज़ा कर इसे ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया. 1850 में अवध के आख़िरी नवाब वाजिद अली शाह ने ब्रिटिश अधीनता स्वीकार कर ली और इसी के साथ लखनऊ के नवाबों का शासन ख़त्म हो गया.

इसके बाद 1902 में नार्थ वेस्ट प्रोविन्स का नाम बदल कर यूनाइटिड प्रोविन्स ऑफ आगरा एंड अवध कर दिया गया. आम बोलचाल की भाषा में इसे यूनाइटेड प्रोविन्स या यूपी कहा गया. फिर 1920 में प्रदेश की राजधानी को इलाहाबाद से बदल कर लखनऊ कर दिया गया. राज्य का उच्च न्यायालय इलाहाबाद ही बना रहा और लखनऊ में उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ स्थापित की गई. आज़ादी के बाद 12 जनवरी, 1950 को इस इलाक़े का नाम बदल कर उत्तर प्रदेश रख दिया गया और लखनऊ इसकी राजधानी बना.

पुराने लखनऊ में चौक का बाज़ार अहम है. यह चिकन के कारीगरों और बाज़ारों के लिए मशहूर है.  चिकन के कपड़े और लज़ीज़ मिठाइयों के लिए लखनऊ में इससे अच्छी जगह नहीं मिलेगी. इसी चौक में नक्खास बाज़ार भी है. यहां का अमीनाबाद दिल्ली के चांदनी चौक की याद दिला देता है. यह बाज़ार शहर के बीचोबीच है. यहां थोक का सामान, सजावटी सामान, ज़ेवरात और कपड़े वगैरह मिलते हैं. दिल्ली में जो दर्जा कनॉट प्लेस को हासिल है, वही मुक़ाम लखनऊ में हज़रतगंज का है. यहां ख़ूब चहल-पहल रहती है. उत्तर प्रदेश का विधानसभा भवन भी इसी इलाक़े में है. इसके अलावा लाल बाग़, बेगम हज़रत महल पार्क,  कैथेड्रल चर्च, चिड़ियाघर, उत्तर रेलवे का मंडलीय रेलवे कार्यालय, मुख्य डाकघर,  पोस्टमास्टर जनरल कार्यालय, परिवर्तन चौक वगैरह भी यहां हैं. इनके अलावा निशातगंज, डालीगंज, सदर बाज़ार, बंगला बाज़ार, नरही, केसर बाग़ भी यहां के बड़े बाज़ारों में शामिल हैं.

चिकन लखनऊ की कशीदाकारी का बेहतरीन नमूना है. लखनवी ज़रदोज़ी यहां का लघु उद्योग है. ज़रदोज़ी फ़ारसी ज़बान का लफ़्ज़ है, जिसका मतलब है सोने की कढ़ाई. यह कढ़ाई हिन्दुस्तान और पाकिस्तान में प्रचलित है. मुगल बादशाह अकबर के दौर में ज़रदोज़ी और समृद्ध हुई, लेकिन बाद में शाही संरक्षण की कमी और औद्योगिकरण के दौर में इसकी चमक मांद पड़ने लगी. मौजूदा दौर में इसका चलन फिर से बढ़ गया और इसकी चमक हिन्दुस्तान से लेकर विलायत तक झिलमिलाने लगी. लखनऊ के अलावा भोपाल और चेन्नई आदि कई शहरों में भी चिकन का काम होता है. चिकन की तक़रीबन 36 शैलियां हैं,  मुर्रे, जाली, बखिया, टेप्ची, टप्पा आदि शामिल हैं. उस्ताद फ़याज़ खां और हसन मिर्ज़ा साहिब चिकन के मशहूर कारीगर थे. हमने यहां से अम्मी के लिए चिकन के सूट ख़रीदे और अपने लिए चिकन के सूटों के  अलावा ज़रदोज़ी के काम वाली लहंगा-चुन्नी ख़रीदी. यहां जो लहंगा- चुन्नी हमें 35 हज़ार में मिल गई, वो दिल्ली में 50 हज़ार में भी नहीं मिल पाती. अब कपड़ों के साथ चूड़ियां न ली जाएं, भला यह कैसे हो सकता है. हरी, नीली, पीली और  गुलाबी कांच की चूड़ियों के साथ सुनहरी और नुक़रई यानी चांदी रंग की चूड़ियां भी ग़ज़ब ढा रही थीं.चुनांचे  उन्हें भी ले ही लिया.        

लखनऊ का खाना भी लाजवाब है. पुरानी दिल्ली के खाने का ज़ायक़ा यहां आपको मिलेगा. सच पूछिए तो मुग़लई खाने की लज़्ज़त किसी और शैली के खाने में मिल ही नहीं सकती. बिरयानी, कबाब, कौरमा, क़ीमा, नाहरी, शीरमाल, ज़र्दा, शाही टुकड़े, नान और रुमाली रोटी के क्या कहने. वहीं अकबरी गेट पर मिलने वाले हाजी मुराद अली के टुंडे के कबाब भी कम लज़ीज़ नहीं हैं. दिल्ली के दरयागंज के  कबाब के बाद यहीं के कबाब हमें पसंद आये. सईद साहब अकसर हमारे लिए लखनऊ से कबाब लेकर आते हैं. खाने के साथ, चाट, मिठाई और पान का ज़िक्र न आए, ऐसा तो हो ही नहीं सकता. यहां की मिठाइयों में जितनी लज़्ज़त है, उतनी ही चटपटी चाट भी है. पान के तो क्या कहने, हम सादा पान ही खा लेते हैं, कभी-कभार इसलिए बाक़ी पान के ज़ायक़ों के बारे में क्या कहें.

लखनऊ का ज़िक्र आते ही 1960 में गुरुदत्त फिलम्स के बैनर तले बनी फ़िल्म चौदहवीं का चांद का एक गीत याद आ जाता है, जो लखनऊ की तहज़ीब पर रचा गया था. मशहूर शायर शकील बदायूंनी के  लिखे इस गीत को मुहम्मद रफ़ी साहब ने गाया था, जिसके बोल हैं-
ये लखनऊ की सरज़मीं
ये लखनऊ की सरज़मीं
ये रंग रूप का चमन
ये हुस्न-ओ-इश्क़ का वतन
यही तो वो मुक़ाम है
जहां अवध की शाम है
जवां-जवां हसीं- हसीं
ये लखनऊ की सरज़मीं 


शबाब-ओ-शेर का ये घर
ये अहल-ए-इल्म का नगर
है मंज़िलों की गोद में
यहां हर एक रहगुज़र
ये शहर लालदार है
यहां दिलों में प्यार है
जिधर नज़र उठाइये
बहार ही बहार है
कली-कली है नाज़नीं
ये लखनऊ की सरज़मीं ...


यहां की सब रवायतें
अदब की शाहकार हैं
अमीर अहल-ए-दिल यहां 
ग़रीब जां-निसार हैं
हर एक शाख़ पर यहां
हैं बुलबुलों के चह चहे
क़दम-क़दम पे कहकहे
हर एक नज़ारा दिलनशीं 
ये लखनऊ की सरज़मीं
यहां के दोस्त बावफ़ा
मोहब्बतों से आशना
निभाई अपनी आन भी
बढ़ाई दिल की शान भी
हैं ऐसे मेहरबां भी
कहो तो दे दें जान भी
जो दोस्ती को यक़ीन 
ये लखनऊ की सरज़मीं ...               
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ज़िन्दगी में रंग भरें...


फ़िरदौस ख़ान
ज़िन्दगी बहुत ख़ूबसूरत है...लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें अपनी ज़िन्दगी बेहद नीरस और बेमक़सद नज़र आती है...यक़ीन मानिए, ज़िन्दगी कभी भी बोझल नहीं होती...यह तो हमारा नज़रिया है जो को ख़ूबसूरत या बदसूरत बनता है...पिछले दिनों डायमंड बुक्स की किताब 'आपके भीतर छिपी सफलता पाने की आठ शक्तियां' पढ़ी...इसके लेखक शिशिर श्रीवास्तव हैं. इस किताब में बताया गया कि किस तरह ज़िंदगी से मायूस व्यक्ति अपने जीवन में इंद्रधनुषी रंग भर सकता है. लेखक का कहना है कि उज्ज्वल एवं सफल भविष्य की राह आपके अपने हाथों में है. ईश्वर भी आपको मार्गदर्शन देंगे और राह दिखाएंगे, पर आधा रास्ता तय होने के बाद. किसी ने कहा है कि कोई भी लौटकर नए सिरे से आरंभ नहीं कर सकता, किंतु कोई भी अबसे आरंभ करते हुए एक नया अंत रच सकता है. बक़ौल हज़रत इनायत खान, आत्मा को उज्ज्वल कर देने वाले शब्द रत्नों से भी अधिक मूल्यवान होते हैं. किताब का एक अध्याय है प्रेम की शक्ति. प्रेम एक कर देने वाली वह शक्ति है, जो ब्रह्मांड में हमें हमारा सच्चा उद्देश्य पाने में सहायक होती है. यह भाव उष्मा, आदान-प्रदान, आनंद, करुणा, आभार, निकटता, सेवाभाव और क्षमा से संबंध रखता है. अल्बर्ट आइंस्टाइन के मुताबिक़, एक मनुष्य उसी संपूर्ण का अंश है, जिसे हम ब्रह्मांड कहते हैं. वह अंश जो समय और काल से सीमित है. वह स्वयं का, अपने विचारों का और भावनाओं का सबसे अलग अनुभव करता है. चेतना का दृष्टिभ्रम एक क़ैद है, जो हमें हमारी निजी इच्छाओं और निकटतम जन के स्नेह तक ही बांध देता है. हमें सभी जीवों और प्रकृति के प्रति करुणा का भाव विस्तृत करते हुए इस दायरे को बढ़ाना चाहिए.

प्रेम शब्द का प्रयोग प्राय: दो प्रेमियों के बीच सशक्त स्नेह भाव को प्रकट करने के लिए किया जाता है. वहीं दूसरी ओर शर्त या समझौता रहित प्रेम परिवार के सदस्यों, मित्रों, पड़ोसियों और अन्य वचनबद्ध संबंधों के लिए होता है. जब आप किसी व्यक्ति से उसके कार्यों या मान्यता से परे जाकर प्रेम करते हैं तो वह अन्कंडीशनल लव कहलाता है. सच्चा प्यार सबके लिए होता है, जैसे सूर्य की किरणें, जो उष्मा देती हैं. गुलाब की पंखुड़ियां जीवन में रंग और आनंद लाती हैं, पर्वत का झरना मुक्त रूप से प्रवाहित होता है और सभी जीवों के लिए समान रूप से उपलब्ध होता है. लोग इसी प्रेम के अभाव में क्रोध, उलझन और व्यग्रता के शिकार होते हैं. जिस तरह शरीर को भोजन और पानी चाहिए, उसी तरह हमारे मन को भावनात्मक रूप से स्नेह चाहिए. जहां भी इसका अभाव होता है, लोग असामान्य रूप से व्यवहार करते हैं तथा दूसरों के ध्यानाकर्षण के लिए हिंसक और आक्रामक साधनों का सहारा लेते हैं.

प्रेम वही है, जो बिना किसी अपेक्षा के किया जाए. यहां बदले में कोई अपेक्षा नहीं होती है. जब हम सच्चे हृदय से सबको स्नेह देने लगते हैं तो ब्रह्मांड से हमारा कोई तार जुड़ जाता है और हमारे भीतर से सूर्य की तरह प्रेम की उज्ज्वल और सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होने लगती है. सूर्य की तरह प्रेम की शक्ति का प्रभाव स्वयं पर भी पड़ता है. हम सच्चा स्नेह देते हैं तो बदले में स्वयं भी वही पाते हैं. जब आप धरती के सभी जीवों को एक समान भाव से स्नेह देते हैं तो सबके साथ जुड़ाव का एक गहरा नाता विकसित होता है. हम परस्पर और प्रत्येक से एक सशक्त संबंध रखते हैं. इस प्रकार प्रेम की शक्ति हमें सदा उपलब्ध रहती है. आप बक़ौल सर विंस्टन चर्चिल, हमें जो मिलता है, उससे अपनी आजीविका चलाते हैं. हम जो देते हैं, उससे एक जीवन बनाते हैं. जब आप स्वयं को क्रोध, ईर्ष्या और वासना आदि नकारात्मक भावों से मुक्त कर देते हैं तो आपके हृदय के भीतर सच्चे प्रेम के अंकुर विकसित होते हैं. जब आप इन भावों को मिटा देते हैं तो आपके भीतर ब्रह्मांड के सकारात्मक प्रवाह को समा लेने का स्थान बन जाता है. यह अच्छे कर्मों और क्षमादान के अभ्यास से ही संभव है. प्रेम की शक्ति अपने साथ सत्यता, सौंदर्य, ऊर्जा, ज्ञान, स्वतंत्रता, अच्छाई और प्रसन्नता का वरदान लाती है. जब चारों ओर प्रेम होता है तो नकारात्मक प्रभाव भी क्षीण हो जाते हैं. प्रेम की सकारात्मक तरंगें नकारात्मकता को मिटा देती हैं. जब आप तुलना छोड़कर स्वयं को सृजन चक्र से जोड़ देते हैं तो आपके हृदय में बसी प्रेम की शक्ति में निखार आता है. मदर टेरेसा ने कहा था, हम इसी उद्देश्य के लिए जन्मे हैं, प्रेम करने और पाने के लिए.

प्रेम रचनात्मक विचारों के प्रति केंद्रित होने में सहायक होता है, हमें अपने लक्ष्यों पर भरोसा बनाए रखने में सहायक होता है, हमारी कल्पना एवं आंतरिक शक्ति में वृद्धि करता है. यह एक रचनात्मक और निरंतर बनी रहने वाली ऊर्जा है और आकाश के तारों की तरह अनंत है. प्रेम में चुंबकीय और चमत्कारी शक्तियां हैं और ये पदार्थ और ऊर्जा से परे हैं. एक बेहद रोचक कहानी है. एक निर्धन लड़का अपनी शिक्षा का खर्च चलाने के लिए घर-घर जाकर वस्त्र बेचता था. एक दिन उसे एहसास हुआ कि उसकी जेब में केवल दस सेंट बचे हैं. वह भूखा था, उसने तय किया कि वह अगले घर से थोड़ा भोजन मांगेगा. जब उसने एक ़खूबसूरत युवती को घर का दरवाज़ा खोलते देखा तो उसकी भूख मर गई. वह भोजन की बजाय एक गिलास पानी मांग बैठा. युवती ने उसे पानी की बजाय दूध ला दिया. लड़के ने दूध पीने के बाद पूछा, इसके लिए कितना देना होगा? जवाब मिला, तुम्हें कुछ नहीं देना होगा, मेरी मां ने सिखाया है कि किसी की भलाई करने के बाद उससे अपेक्षा नहीं करनी चाहिए. लड़का बोला, मैं आपको दिल से धन्यवाद देता हूं. कई वर्षों बाद वह महिला बीमार हो गई. स्थानीय डॉक्टरों ने उसे शहर के बड़े अस्पताल में भेज दिया, ताकि वहां के विशेषज्ञ उसकी खोई सेहत लौटा सकें. वहां डॉ. हावर्ड कैली कंसल्टेट थे. जब उन्होंने महिला के शहर का नाम सुना तो स्वयं वहां पहुंच गए. उन्होंने झट से उस दयालु महिला को पहचान लिया और उसकी प्राण रक्षा का संकल्प लिया. वह पहले दिन से ही उस मामले पर विशेष ध्यान देने लगे और वह महिला स्वस्थ हो गई. उन्होंने निर्देश दे रखे थे कि महिला का बिल उन्हें ही दिया जाए. उन्होंने बिल देखा और उसके कोने पर कुछ लिखकर महिला के कमरे में भेज दिया. महिला को लगा कि उसे आजीवन वह भारी बिल अदा करना होगा, पर बिल के कोने में लिखा था, एक गिलास दूध के बदले में दिया गया: डॉ. हावर्ड कैली.

दरअसल, प्रेम आपके भीतर विनय भाव पैदा करता है. क्षमा करना आत्मा का सौंदर्य है, जिसे प्राय: नकार दिया जाता है. हो सकता है कि कई बार दूसरे आपके कष्ट का कारण बनें. आप स्वयं को आहत और क्रोधित पाएंगे. ऐसे में आपको इसे भूलना सीखना होगा. किसी को क्षमा करते ही आपके मन को भी चैन आ जाएगा. आप भी अतीत के घावों से मुक्त होंगे और समय सारे कष्ट सोख लेगा. यहां आपका मा़फ करने और भुला देने का निर्णय अधिक महत्व रखता है. बक़ौल मैक्स लुकाडो, क्षमा देने का अर्थ है, किसी को मुक्त करने के लिए द्वार खोलना और स्वयं को एक मनुष्य के रूप में एहसास दिलाना.जब आप स्वयं तथा दूसरों से सच्चा प्रेम करते हैं तो पाएंगे कि पूरा संसार आपसे प्रेम करने लगा है. लोग धीरे-धीरे आपको चाहने लगेंगे. यदि लोग परस्पर ईमानदारी और प्रेम से बात करें तो सभी संघर्षों का समाधान हो सकता है. जब आप प्रत्येक समस्या का सामना प्रेम से करेंगे तो आपका कोई शत्रु नहीं होगा. लोग आपको एक नई नज़र से देखेंगे, क्योंकि उनके विचार अलग होंगे और वे आपके बारे में पहले से एक प्रभाव बना चुके होंगे. बक़ौल गोथे फॉस्ट, एक मनुष्य संसार में वही देखता है, जो उसके हृदय में होता है. एक सदी पहले तक लोग बिना किसी पासपोर्ट या वीजा, बिना किसी पाबंदी के पूरी दुनिया में कहीं भी जा सकते थे. राष्ट्रीय सीमाओं का पता तक नहीं था. दो विश्व युद्धों के बाद कई राष्ट्र स्वयं को असुरक्षित महसूस करने लगे, पहचान का संकट उभरा और कई संकीर्ण राष्ट्रवादी भावनाएं सामने आ गईं. ये भावनाएं इतनी मज़बूत थीं कि बच्चों को अपने ही देश की सभ्यता और परंपरा पर गर्व करना सिखाया जाने लगा और देशभक्ति का विचार पनपा. इसने पूरी दुनिया के धनी और निर्धनों की खाई को गहरा कर दिया. बक़ौल मोकीची ओकादा, यदि आप संसार से प्रेम करेंगे और लोगों की सहायता करेंगे तो आप जहां भी जाएंगे, ईश्वर आपकी सहायता करेंगे. किताब बताती है कि इंसान के अंदर ही वह शक्ति छिपी हुई है, जिसे पहचान कर वह अपने जीवन में बेहतरीन बदलाव ला सकता है. याद रखें कि ज़िन्दगी बार-बार नहीं मिलती...


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अपने देश में बेगानी हिन्दी...




हर भाषा की अपनी अहमियत होती है...फिर भी मातृ भाषा हमें सबसे प्यारी होती है...क्योंकि उसी ज़बान में हम बोलना सीखते हैं...बच्चा सबसे पहले मां ही बोलता है...इसलिए भी मां बोली हमें सबसे अज़ीज़ होती है... लेकिन देखने में आता है कि कुछ लोग जिस भाषा के सहारे ज़िन्दगी बसर करते हैं, यानी जिस भाषा में लोगों से संवाद क़ायम करते हैं, उसी को 'तुच्छ' समझते हैं...बार-बार अपनी मातृ भाषा का अपमान करते हुए अंग्रेजी की तारीफ़ में क़सीदे पढ़ते हैं...हिन्दी के साथ ऐसा सबसे ज़्यादा हो रहा है...वो लोग जिनके पुरखे अंग्रेजी का 'ए' नहीं जानते थे, वो लोग भी हिन्दी को गरियाते हुए मिल जाएंगे...हक़ीक़त में ऐसे लोगों को न तो ठीक से हिन्दी आती है और न ही अंग्रेजी...दरअसल, वो तो हिन्दी को गरिया कर अपनी 'कुंठा' का 'सार्वजनिक प्रदर्शन' करते रहते हैं...
अंग्रेजी भी अच्छी भाषा है...इंसान को अंग्रेजी ही नहीं, दूसरी देसी-विदेशी भाषाएं भी सीखनी चाहिए...इल्म हासिल करना तो अच्छी बात है,
लेकिन अपनी मातृ भाषा की कुर्बानी देकर किसी दूसरी भाषा को अपनाना हमें तो क़तई मंजूर नहीं...और आपको...?


अपने देश में बेगानी हिन्दी... 
-फ़िरदौस ख़ान
देश की आज़ादी को छह दशक से भी ज़्यादा का वक़्त बीत चुका है। इसके बावजूद अभी तक हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों का आयोजन कर रस्म अदायगी कर ली जाती है। हालत यह है कि कुछ लोग तो अंग्रेज़ी में भाषण देकर हिन्दी की दुर्दशा पर घड़ियाली आंसू बहाने से भी नहीं चूकते।

गौरतलब है कि संवैधानिक रूप से हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है। यह देश की सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है। इतना ही नहीं चीनी के बाद हिन्दी दुनियाभर में सबसे ज़्यादा बोली और समझी जाती है। भारत में उत्तर और मध्य भागों में हिन्दी बोली जाती है, जबकि विदेशों में फ़िज़ी, गयाना, मॉरिशस, नेपाल और सूरीनाम के कुछ बाशिंदे हिन्दी भाषी हैं। एक अनुमान के मुताबिक़ दुनियाभर में क़रीब 60 करोड़ लोग हिन्दी बोलते हैं।

देश में सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा होने के बाद भी हिन्दी राष्ट्रीय भाषा नहीं बन पाई है। हिन्दी हमारी राजभाषा है। राष्ट्रीय और आधिकारिक भाषा में काफ़ी फ़र्क है। जो भाषा किसी देश की जनता, उसकी संस्कृति और इतिहास को बयान करती है, उसे राष्ट्रीय भाषा कहते हैं। मगर जो भाषा कार्यालयों में उपयोग में लाई जाती है, उसे आधिकारिक भाषा कहा जाता है। इसके अलावा अंग्रेज़ी को भी आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है।

संविधान के अनुचछेद-17 में इस बात का ज़िक्र है कि आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा नहीं माना जा सकता है। भारत के संविधान के मुताबिक़ देश की कोई भी अधिकृत राष्ट्रीय भाषा नहीं है। यहां 23 भाषाओं को आधिकारिक भाषा के तौर पर मंज़ूरी दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 344 (1) और 351 के मुताबिक़ भारत में अंग्रेज़ी सहित 23 भाषाएं बोली जाती हैं, जिनमें आसामी, बंगाली, बोडो, डोगरी, गुजराती, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मैथिली, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, संथाली, सिंधी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल हैं। ख़ास बात यह भी है कि राष्ट्रीय भाषा तो आधिकारिक भाषा बन जाती है, लेकिन आधिकारिक भाषा को राष्ट्रीय भाषा बनाने के लिए क़ानूनी तौर पर मंज़ूरी लेना ज़रूरी है। संविधान में यह भी कहा गया है कि यह केंद्र का दायित्व है कि वह हिन्दी के विकास के लिए निरंतर प्रयास करे। विभिन्नताओं से भरे भारतीय परिवेश में हिन्दी को जनभावनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनाया जाए।

भारतीय संविधान के मुताबिक़ कोई भी भाषा, जिसे देश के सभी राज्यों द्वारा आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया गया हो, उसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा गया है। मगर हिन्दी इन मानकों को पूरा नहीं कर पा रही है, क्योंकि देश के सिर्फ़ 10 राज्यों ने ही इसे आधिकारिक भाषा के तौर पर अपनाया है, जिनमें बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश शामिल है। इन राज्यों में उर्दू को सह-राजभाषा का दर्जा दिया गया है। उर्दू जम्मू-कश्मीर की राजभाषा है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है। संविधान के लिए अनुच्छेद 351 के तहत हिन्दी के विकास के लिए विशेष प्रावधान किया गया है।

ग़ौरतलब है कि देश में 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू हुआ था। देश में हिन्दी और अंग्रेज़ी सहित 18 भाषाओं को आधिकारिक भाषा का दर्जा हासिल है, जबकि यहां क़रीब 800 बोलियां बोली जाती हैं। दक्षिण भारत के राज्यों ने स्थानीय भाषाओं को ही अपनी आधिकारिक भाषा बनाया है। दक्षिण भारत के लोग अपनी भाषाओं के प्रति बेहद लगाव रखते हैं, इसके चलते वे हिन्दी का विरोध करने से भी नहीं चूकते। 1940-1950 के दौरान दक्षिण भारत में हिन्दी के ख़िलाफ़ कई अभियान शुरू किए गए थे। उनकी मांग थी कि हिन्दी को देश की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा न दिया जाए।

संविधान सभा द्वारा 14 सितम्बर, 1949 को सर्वसम्मति से हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया था। तब से केन्द्रीय सरकार के देश-विदेश स्थित समस्त कार्यालयों में प्रतिवर्ष 14 सितम्बर हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए हर साल 14 सितंबर को हिन्दी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 343 (1) के मुताबिक़ भारतीय संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपी देवनागरी होगी। साथ ही अंकों का रूप अंतर्राष्टीय्र स्वरूप यानी 1, 2, 3, 4 आदि होगा। संसद का काम हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में किया जा सकता है, मगर राज्यसभा या लोकसभा के अध्यक्ष विशेष परिस्थिति में सदन के किसी सदस्य को अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुमति दे सकते हैं। संविधान के अनुच्छोद 120 के तहत किन प्रयोजनों के लिए केवल हिन्दी का इस्तेमाल किया जाना है, किन के लिए हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं का इस्तेमाल ज़रूरी है और किन कार्यों के लिए अंग्रेज़ी भाषा का इस्तेमाल किया जाना है। यह राजभाषा अधिनियम 1963, राजभाषा अधिनियम 1976 और उनके तहत समय-समय पर राजभाषा विभाग गृह मंत्रालय की ओर से जारी किए गए दिशा-निर्देशों द्वारा निर्धारित किया गया है।

पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के चलते अंग्रेज़ी भाषा हिन्दी पर हावी होती जा रही है। अंग्रेज़ी को स्टेट्स सिंबल के तौर पर अपना लिया गया है। लोग अंग्रेज़ी बोलना शान समझते हैं, जबकि हिन्दी भाषी व्यक्ति को पिछड़ा समझा जाने लगा है। हैरानी की बात तो यह भी है कि देश की लगभग सभी बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं अंग्रेज़ी में होती हैं। इससे हिन्दी भाषी योग्य प्रतिभागी इसमें पिछड़ जाते हैं। अगर सरकार हिन्दी भाषा के विकास के लिए गंभीर है तो इस भाषा को रोज़गार की भाषा बनाना होगा। आज अंग्रेज़ी रोज़गार की भाषा बन चुकी है। अंग्रेज़ी बोलने वाले लोगों को नौकरी आसानी से मिल जाती है। इसलिए लोग अंग्रेज़ी के पीछे भाग रहे हैं। आज छोटे क़स्बों तक में अंग्रेज़ी सिखाने की 'दुकानें' खुल गई हैं। अंग्रेज़ी भाषा नौकरी की गारंटी और योग्यता का 'प्रमाण' बन चुकी है। अंग्रेज़ी शासनकाल में अंग्रेज़ों ने अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए अंग्रेज़ियत को बढ़ावा दिया, मगर आज़ाद देश में मैकाले की शिक्षा पध्दति को क्यों ढोया जा रहा है, यह समझ से परे है।

हिन्दी के विकास में हिन्दी साहित्य के अलावा हिन्दी पत्रकारिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है। इसके अलावा हिन्दी सिनेमा ने भी हिन्दी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा दिया है। मगर अब सिनेमा की भाषा भी 'हिन्गलिश' होती जा रही है। छोटे पर्दे पर आने वाले धारावाहिकों में ही बिना वजह अंग्रेज़ी के वाक्य ठूंस दिए जाते हैं। हिन्दी सिनेमा में काम करके अपनी रोज़ी-रोटी कमाने वाले कलाकार भी हर जगह अंग्रेज़ी में ही बोलते नज़र आते हैं। आख़िर क्यों हिन्दी को इतनी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा है? यह एक ज्वलंत प्रश्न है।

अधिकारियों का दावा है कि हिन्दी राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, जनभाषा के सोपानों को पार कर विश्व भाषा बनने की ओर अग्रसर है, मगर देश में हिन्दी की जो हालत है, वो जगज़ाहिर है। साल में एक दिन को ‘हिन्दी दिवस’ के तौर पर माना लेने से हिन्दी का भला होने वाला नहीं है। इसके लिए ज़रूरी है कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए ज़मीनी स्तर पर ईमानदारी से काम किया जाए। (स्टार न्यूज़ एजेंसी)
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नील का हम पर हक़ है...


फ़िरदौस ख़ान
नील दुनिया की सबसे लंबी नदी है. क़ुरआन और बाइबल में भी इस नदी का ज़िक्र आता है. नबी और यहूदी धर्म के संस्थापक  हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को उनकी मां ने नील नदी के हवाले कर दिया था.  मिस्र के फ़िरऔन के ज़माने में जन्मे मूसा यहूदी माता-पिता के की औलाद थे, लेकिन मौत के डर से उनकी मां ने उन्हें नील नदी में बहा दिया था. उन्हें फ़िरऔन की पत्नी ने पाला और मूसा एक मिस्री शहज़ादे  बने. बाद में मूसा को मालूम हुआ कि वो यहूदी हैं और उनके यहूदी मुल्क  को फ़िरऔन ने ग़ुलाम बना लिया है. हज़रत मूसा ने एक मिस्री व्यक्ति से एक यहूदी को पिटते देखा तो उन्हें ग़ुस्सा आ गया और उन्होंने उस मिस्री को मार डाला और मदैन चले गए.  वहां उन्होंने विवाह कर लिया और अपने ससुर के घर 10 साल तक रहकर उनकी ख़िदमत की. इसके बाद वह अपने परिवार सहित वहां से रवाना हो गए. एक पहाड़ पर उन्होंने आग जलती देखी. वह अकेले पहाड़ पर गए.  यहां  हज़रत  मूसा की अल्लाह से मुलाक़ात हुई. अल्लाह के आदेश पर उन्होंने फ़िरऔन को हराकर यहूदियों को आज़ाद कराया और उन्हें मिस्र से इस्राईल पहुंचाया.

जब हज़रत मूसा अपने लोगों को आज़ाद कराकर मिस्र से रवाना हुए तो फ़िरऔन की फ़ौजों ने उनका पीछा किया. फ़ौज को आते देख हज़रत मूसा ने नील से रास्ता मांगा. और फिर नील नदी में रास्ता बन गया. सभी लोग नील को पार कर दूरी तरफ़ पहुंच गए, लेकिन जब फ़िरऔन की फौजें इस रस्ते पर आईं तो नील ने सबको गर्क कर दिया. मगर नील ने फ़िरऔन को वापस फ़ेंक दिया. रास्ते में इस्राईल संतति को अल्लाह की तरफ़ से दिव्य भोजन- 'मन्न', 'सल्वा' आता था. जब वह अल्लाह से बात करने और उसके आदेश लेने के लिए गए थे और अपने भाई हारून के ज़िम्मे इस्राईल संतति को कर गए थे. इस दौरान कुछ लोगों ने 'सामरी' के बहकावे में आकर एक बछड़ा बनाकर उसकी पूजा शुरू कर दी. सामरी ने जिब्राइल की धूलि से बछड़े में बोलने की शक्ति तक पैदा कर दी थी. जब हज़रत मूसा ने अल्लाह से बात की तो जवाब मिला - तू न देख सकेगा. अच्छा पहाड़ की तरफ़  देख. उस तेज़ को देख वह मूर्च्छित होकर गिर पड़े. अल्लाह ने अपने आदेश को पट्टियों पर लिखकर उन्हें दिए. हज़रत मूसा ने इस्राईल को अल्लाह द्वारा मिले 'दस आदेश' दिए,  जो आज भी यहूदी धर्म का प्रमुख स्तंभ है. क़ाबिले-गौर है कि फ़िरऔन की लाश को एक बक्से में रखा गया है.

गौरतलब  है कि  नील नदी अफ्रीका की सबसे बड़ी झील विक्टोरिया से निकलकर सहारा मरुस्थल के पूर्वी हिस्से को पार करती हुई उत्तर में भूमध्यसागर में गिरती है. यह भूमध्य रेखा के निकट भारी वर्षा वाले क्षेत्रों से निकलकर दक्षिण से उत्तर क्रमशःयुगाण्डा, इथियोपिया, सूडान एवं मिस्र से होकर बहते हुए एक लंबी घाटी बनाती है, जिसके दोनों तरफ़ की ज़मीन पतली पट्टी के रूप में हरी-भरी   नज़र आती है. यह पट्टी दुनिया का सबसे बड़ा मरूद्यान है. इसकी कई सहायक नदियां हैं, जिनमें श्वेत नील एवं नीली नील मुख्य हैं. अपने मुहाने पर यह 160 किलोमीटर लंबा और 240 किलोमीटर चौड़ा विशाल डेल्टा बनाती है. घाटी का सामान्य ढाल दक्षिण से उत्तर की ओर है. मिस्र की प्राचीन सभ्यता का विकास इसी नदी की घाटी में हुआ है. इसी नदी पर मिस्र देश का प्रसिद्ध अस्वान बांध बनाया गया है.

नील नदी की घाटी का दक्षिणी भाग भूमध्य रेखा के समीप स्थित है. यहां भूमध्यरेखीय जलवायु पाई जाती है. यहां साल भर तापमान ज़्यादा रहता है.  सालाना बारिश का औसत 212 सेमी. है. इसी वजह से यहां भूमध्यरेखीय सदाबहार के वन पाए जाते हैं. नील नदी के मध्यवर्ती भाग में सवाना तुल्य जलवायु पाई जाती है. इस प्रदेश में सवाना नामक उष्ण कटिबन्धीय घास का मैदान है. यहां पाए जाने वाले गोंद देने वाले पेड़ों के कारण सूडान दुनिया का सबसे बड़ा गोंद उत्पादक देश है. उत्तरी भाग में वर्षा के अभाव में खजूर, कंटीली झाड़ियां और  बबूल आदि मरुस्थलीय वृक्ष मिलते हैं. उत्तर के डेल्टा क्षेत्र में भूमध्यसागरीय जलवायु पाई जाती है. यहां वर्षा सर्दियों के मौसम में होती है...

नील नदी के बारे में लिखी मिस्र के प्रोफ़ेसर अहमद अल क़ादी की यह नज़्म याद आती है...
मिस्र की तरफ़ लौट आओ 
नील का पानी हम सबके लिए काफ़ी है...

उसने तुम्हें ज़िन्दगी के
वो अच्छे दिन अता किए
जिन्हें तुम याद करते रहते हो...
फिर तेल ने डॉलर को लेकर 
हमने बहकना चाहा...

मिस्र की तरफ़ लौट आओ 
उसके किनारों की गहराइयों में जाओ
नील का हम पर हक़ है...

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पुस्तक समीक्षा : स्मृतियों में रूस



-फ़िरदौस ख़ान
हमेशा से हमारे मन में रूस के लिए एक विशेष आकर्षण रहा है. बचपन में रूस की परियों, राजकुमारियों, राजकुमारों और ज़ार (राजा) की  कहानियां पढ़ा करते थे, उम्र बढ़ने के साथ-साथ रूसी साहित्य के लिए दिलचस्पी भी बढ़ती गई. हालत यह हो गई कि घर की लाइब्रेरी में रूसी साहित्य की किताबें ज़्यादा नज़र आने लगीं. कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. रूसी साहित्य से वहां की सभ्यता और संस्कृति को जानने का मौक़ा मिला. लेनिन पुरस्कार विजेता लोक कवि रसूल हमज़ातोव की किताब 'मेरा दागिस्तान' तो कास्पियन सागर के पास काकेशिया के पर्वतों की ऊंचाइयों पर बसे दागिस्तान के पहाड़ी गांवों में ले जाती है. जब शिखा वार्ष्णेय की किताब 'स्मृतियों में रूस' हाथ में आई तो हम भूख-प्यास सब भूलकर किताब में खो गए और देर रात तक इसे पढ़ते रहे. इस किताब के ज़रिये हमें एक ऐसी लड़की के नज़रिए से रूस को जानने का मौक़ा मिला, जो पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए अकेली घर से निकलती है और फिर परदेस में कई परेशानियों का सामना करते हुए अपनी मंज़िल को हासिल करती है. लेखिका के संस्मरण इतने जीवंत हैं कि वे पढ़ने वाले को उस वक़्त में ले जाकर खड़ा कर देते हैं, जब ये सब घटनाएं घट रही थीं.

बक़ौल शिखा वार्ष्णेय, इस अनोखे देश में बहुत से आश्चर्यजनक अनुभव हुए. एक नई संस्कृति और समाज के अलावा जीवन को बहुत क़रीब से जानने का अवसर मिला. नए दृष्टिकोण और नई परिस्थितियों से गुज़रकर जीवन के कई रंगों से रूबरू होने का मौक़ा भी मिला, जिन्हें पूरी तरह शब्दों में ढालना तो संभव नहीं, परंतु उन अनमोल पलों को सहेजकर इस पुस्तक के माध्यम से आपके सामने प्रस्तुत करने की एक छोटी सी कोशिश मैंने ज़रूर की है. 1990 से 1996 तक का समय शायद सबसे महवपूर्ण समय था रूस और बाक़ी दुनिया के लिए, जिसे मैंने अपनी दृष्टि से देखा, अनुभव किया और समझा. उसे उसी तरह से आपको दिखाना चाहती हूं. इस पुस्तक के सभी वर्णन, घटनाएं और वक्तव्य पूरी तरह मेरे निजी अनुभवों और विचारों पर आधारित हैं. उस समय के परी लोक को अपनी दृष्टि से आपको दिखाने का एक प्रयास मात्र है यह पुस्तक, जिसका एक-एक शब्द मैंने अनुभूति की स्याही में अपनी स्मृति की क़लम को डुबो-डुबोकर लिखने का प्रयास किया है. देखिये उस समय का रूस मेरी नज़र से.    

प्रसिद्ध लेखक डॉ. विवेकी  राय कहते हैं, यह पुस्तक साहित्य की संस्मरण विधा का समुचित और सार्थक उदहारण है. सोवियत संघ हमारे देश के अनन्य मित्र देश और संकटमोचक की भूमिका में हमेशा उपयुक्त रहा है. लेखिका का सोवियत प्रवास और उनके खट्टे-मीठे अनुभव रूपी संस्मरण रोचकता की लहरों पर सवार होकर पाठकों के हृदय में स्थान बना लेगा, ऐसा मेरा विश्वास है. जन सामान्य भाषा में लिखी गई यह पुस्तक सोवियत देश के सामाजिक, आर्थिक ताने-बाने पर भी एक दृष्टिकोण देने में सफ़ल है. घुमक्कड़ प्रवृति हमेशा से समाज को नए आयाम देती रही है.

वहीं दिव्या माथुर का कहना है कि शिखा की कृति 'स्मृतियों में रूस' पढ़ना एक सुखद अनुभव है. इस पुस्तक में शिखा ने छोटी-बड़ी सभी तरह की घटनाओं का वर्णन अपने संस्मरण और बदलते मूड के अनुसार किया है. उन्होंने बड़ी निपुणता से अपने वेरोनिश पहुंचने की घटना की भयावहता का स्पष्ट वर्णन किया है. हर छोटी घटना के वर्णन में उनकी भाषा सरस और कौतुहल उत्पन्न करने वाली है. घटनाओं का वर्णन, शांत, गतिमान, सत्य और दिखावारहित है.

रोचकता से लबरेज़ इस किताब के आख़िर में लेखिका ने अपनी स्मृतियों को एक कविता के रूप में पेश किया है, जिसे पढ़ना अच्छा लगता है.
यादों की सतह पर चढ़ गई हैं
वक़्त की कितनी ही परतें 
फिर भी कहीं न कहीं से निकलकर 
दस्तक दे जाती हैं यादें 
और मैं मजबूर हो जाती हूं
खोलने को कपाट मन के
फिर निकल पड़ते हैं उदगार
और बिखर जाते हैं काग़ज़ पे 
सच है
गुज़रा वक़्त लौट कर नहीं आता 
पर क्या कभी भूला भी जाता है
कहीं किसी मोड़ पर मिल ही जाता है

बहरहाल, लेखिका की पहली किताब होने के लिहाज़ से यह उनकी लेखन यात्रा पहला पड़ाव है, उन्हें अभी लंबा सफ़र तय करना है. अपने इस सफ़र में वह नए कीर्तिमान स्थापित करें, यही कामना है.  

पुस्तक : स्मृतियों में रूस
लेखिका : शिखा वार्ष्णेय
प्रकाशक : डायमंड पॉकेट बुक्स, नई दिल्ली
मूल्य : 300 रूपये

स्टार न्यूज़ एजेंसी 
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कितने वर्क़ पुरानी यादों के...


ज़िन्दगी की किताब में
कितने वर्क़ पुरानी यादों के
आज भी
मैंने सहेजकर रखे हैं...

कुछ वर्क़
क़ुर्बतों की खुशबू से सराबोर हैं
हथेलियों पर सजी
गीली मेहंदी की
भीनी-भीनी महक की तरह...

और
कुछ वर्क़
हिज्र की स्याह रातों से वाबस्ता हैं
जाड़ों की कोहरे से ढकी
उदास शाम की तरह...

मैंने
आज भी सहेजकर रखा है
पुरानी यादों को
कच्चे ताख़ में रखी
पाक किताबों की तरह...
-फ़िरदौस ख़ान
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न्याय याचना के ज्वलंत सवाल


फ़िरदौस ख़ान
भारतीय साहित्यकार संघ के अध्यक्ष डॉ. वेद व्यथित का खंड काव्य न्याय याचना एक अनुपम कृति है. जैसा नाम से ही ज़ाहिर है कि इसमें न्याय पर सवाल उठाए गए हैं. वह कहते हैं, यह ठीक है कि जानबूझ कर किया गया अपराध अनजाने में हुए अपराध से कहीं भयावह है, लेकिन लापरवाही में किया गया अपराध भी कम भयावह नहीं है. ज़रूर कहीं उसके अवचेतन में व्यवस्था और अनुशासन की अवहेलना है. ठीक है, गंधर्व ने जानबूझ कर ऋषि की अंजलि में नहीं थूका, लेकिन क्या कहीं भी थूक देना उचित है? क्या यह अनुशासनहीनता नहीं है? यह उसकी मदमत्तता और अभिमान नहीं तो क्या है? दूसरा सवाल पश्चाताप का उठाया गया है. गंधर्व चित्रसेन ने ख़ूब पश्चाताप किया है. इसलिए उसे क्षमा कर देना चाहिए. क्यों कर देना चाहिए? पश्चाताप करना उसका व्यक्तिगत मामला है. अपराधी को पश्चाताप तो करना ही चाहिए, लेकिन मात्र पश्चाताप के बाद वह क्षम्य है तो व्यक्ति कुछ भी अपराध करके पश्चाताप कर लेगा. ऐसे में न्यायालय या व्यवस्था का क्या महत्व रह जाएगा? इन्हीं सवालों को इस पौराणिक कथा के ज़रिये उठाने की कोशिश की गई है. विषय तो इसका उत्कृष्ट है ही, भाषा शैली भी सौंदर्य से परिपूर्ण है.

खंड काव्य के प्रथम सर्ग में वह लिखते हैं:-
कब होती है तृप्त देह यह
राग रंग भोगों से
जितना करते यत्न शांत
करने का इस तृष्णा को
वह तो और सुलग जाती,
ऐसी ही प्रतिपल ज्वाला सी
धधक रही थी उनमें
उसी आग को लेकर दोनों
उड़े चले जाते हैं.

द्वितीय सर्ग में भी सुंदर शब्दों से वह वातावरण का मनोहारी वर्णन करते हैं:-
पूरब रंगा सुहाग सूर्य की
सिंदूरी आभा लेकर
विकसे कमल हुआ हर्षित मन
ऊषा का रूपवरण,
अनुकंपा हे ईश! तुम्हारी
तुमको है शत-शत बार नमन
प्रकटो अनंत ज्योति के स्वामी
अंजलि करो स्वीकार प्रवर.

डॉ. वेद व्यथित की कई किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. इनमें मधुरिमा (काव्य नाटक), आ़िखर वह क्या करें (उपन्यास), बीत गए वे पल (संस्मरण), आधुनिक हिंदी साहित्य में नार्गाजुन (आलोचना), भारत में जातीय सांप्रदायिकता (उपन्यास) और अंतर्मन (काव्य संग्रह) शामिल हैं. उन्होंने व्यक्ति चित्र नामक नवीन विधा का सृजन किया है. इसके अलावा त्रिपदी काव्य की नवीन विधा के सृजन का श्रेय भी उन्हीं को जाता है. पंजाबी और जापानी भाषा में उनकी कई रचनाओं का अनुवाद हो चुका है.

बक़ौल डॉ. मनोहर लाल शर्मा, यह युग प्रबंध काव्यों का युग नहीं रह गया है. निराला जी की पंचवटी प्रसंग, राम की शक्ति पूजा और अज्ञेय की असाध्य वीणा जैसी लंबी कविताएं उक्त विवशता के स्वीकरण का पूर्वाभास देती हैं. ऐसी कविताओं में कवि जीवन के समग्रत्व का समावेश करने की केवल चेष्टा कर सकता है. लंबी कविताओं में फिर भी वह बात नहीं आ पाती, जो प्रबंध काव्यों में जीवन के अनेक विषयों, नानाविध मनोभावों, क्रिया-व्यापारों, दृश्यों एवं प्रसंगों की उपस्थिति द्वारा सहज देखने को मिल जाती है. इसी बिंदू से प्रबंध काव्यों की अपरिहार्यता सिद्ध हो जाती है. युग की बेबसियां चाहे कितना ही दबाव रचनाकारों और सहृदयों के मानस पटल पर बनाती रहें, यदि हमें अपने समशील मानव प्राणियों, मानवेतर प्राणियों के मनोभावों, क्रियाकलापों और नानाविध प्रकरणों में अपनी दिलचस्पी को व्याहत नहीं होने देना है तो हमें अंतत: ऐसे प्रबंधों की प्रयोजनीयता को हृदयंगम करना होगा. डॉ. वेद व्यथित का खंड काव्य न्याय याचना इसी मांग की पूर्ति और प्रतिपूर्ति का साहसपूर्ण उपक्रम है. वह जानते होंगे कि धारा के विपरीत किश्ती को तैरा देना कितना विवेकसम्मत है, पर हिम्मती लोग ऐसा कर दिखाते हैं. प्रस्तुत खंड काव्य आज के प्रतिकूल वातावरण, परिवेश और विषम प्रतिक्रियाओं के होते हुए भी एक स्वागत योग्य क़दम है. यह खंड काव्य नए रचनाकारों के लिए भी प्रेरणादायी है.

डॉ. व्यथित कहते हैं:-
तुम न्याय के मंदिर की कहानी लिखना
सूली पे चढ़ू उसकी ज़ुबानी लिखना,
तुम ख़ून को मेरे ही बनाना स्याही
अस्थि को क़लम मेरी बनाकर लिखना.

निस्संदेह, यह खंड काव्य अपने विषय और प्रस्तुति की रोचकता के कारण पठनीय है.
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सुर्ख़ गुलाबों का दिन...


मेरे महबूब! 
आज रोज़ डे है... सुर्ख़ गुलाबों का दिन...महकती यादों का दिन...सोचती हूं कि तुम्हें गुलाब कैसे भेजूं...तुम तो बहुत दूर हो... शायद तुम्हें याद भी नहीं होगा कि आज रोज़ डे है...लेकिन मुझे तो याद है...आज का दिन...बहरहाल तुम्हारे हिस्से के गुलाब तो तुम्हें मिल ही जाएंगे... नेक दुआओं के साथ... हमें तो मिल ही चुके हैं हमारे गुलाब...तुम्हारी मुहब्बत के रूप में... 
मेरे महबूब... हम जानते हैं कि इस वक़्त हमसे ज़्यादा इस मुल्क को तुम्हारी ज़रूरत है...हम भले ही तुमसे दूर हैं, लेकिन रूहानी तौर पर हर वक़्त तुम्हारे साथ हैं...दुआ करते हैं कि तुम फ़तेह हासिल कर अपने घर लौटो...
 
करूं न याद अगर किस तरह भुलाऊं उसे
ग़ज़ल बहाना करूं और गुनगुनाऊं उसे
वो ख़ार-ख़ार है शाख़े-गुलाब की मानिंद
मैं ज़ख़्म-ज़ख़्म हूं  फिर भी गले लगाऊं उसे... 
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मन से उगते हैं अग्निगंधा के फूल...


हमारा प्यारा भाई है अरुण...यानी अरुण सिंह क्रांति...वह जितना अच्छा इंसान है, उतना ही उम्दा लेखक भी है...हम समझते हैं कि किसी भी इंसान को अच्छा लेखक, अच्छा कवि,  अच्छा कलाकार (या अच्छा कोई और) होने से पहले एक अच्छा इंसान होना चाहिए...क्योंकि एक अच्छा इंसान ही अच्छा लेखक, अच्छा कवि, अच्छा कलाकार (या अच्छा कोई और) हो सकता है...हमें अपने भाई अरुण पर नाज़ है...ज़िन्दगी में ऐसे बहुत कम लोग मिलते हैं, जिन पर हम गर्व कर सकें...भाई अरुण में बहुत सी ख़ूबियां हैं... हाल में अरुण की एक किताब प्रकाशित हुई है...इस किताब की भूमिका हमने ही लिखी है...और इस किताब की समीक्षा भी लिखी है...           

उषाकाल का केसरिया आकाश. श्वेत रंग के बाड़े से टेक लगाए एक हल्का आसमानी रंग का पहिया. बाड़े के अंदर हरी, मखमली, कुछ पंक-युक्त घास. एक सूखा वृक्ष, जिससे झड़े आग्नेय-वर्णी पुष्पों को चुनकर टोकरी में एकत्रित करता एक बालक. युवा कवि अरुण सिंह क्रांति के पहले काव्य-संग्रह अग्निगंधा के फूल का ऐसा शानदार आवरण बरबस ही पुस्तक को उठाकर उसके पृष्ठ टटोलने को बाध्य करता है.
कवि के पिता, माता और गुरु के चरणों में समर्पित इस काव्य संग्रह की प्रस्तावना में कवि ने अपने अंदर एक कवि के जन्म लेने का कारण मातृ प्रेरणा बताया है. कवि के मन में लीक से हटकर कुछ करने की भावना रही. इसे उसने बखूबी अंजाम भी दिया है.
अरुण सिंह क्रांति का परिचय दिया जाए, तो वह मन से एक कवि, शौक़ से एक लेखक, पेशे से पत्रकार, परंपरा से ज्योतिषी, अनुवांशिकता से गणित के कोच और आत्मा से एक क्रांतिकारी हैं.
प्रस्तुत काव्य-संग्रह में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं, जो अपने आप में विरली हैं. पहला तो कविताओं का एक विशेष क्रम है. कवि ने पुस्तक का आरंभ मां से किया है, और उपसंहार भी मां से ही किया है. कविताओं की क्रमश: योजना में पहले मां, फ़िर ज्ञान की देवी सरस्वती, फ़िर गुरु, फिर राष्ट्र और समाज, फ़िर नारी-शक्ति, फ़िर एक ऐतिहासिक प्रसंग को स्पर्श करते हुए कवि अपने हृदय के स्पंदनों को काव्य-रूप देता हुआ, प्रेम की हर अभिव्यक्ति को शब्द देता है. कवि सौंदर्य, मन के मंथन, कवि होने का गर्व, आत्म-आलोचना, एक मृत्यु पत्र लिखने के बाद अपनी कविताओं में अग्निगंधा का मर्म बताते हुए फ़िर से मां तक पहुंच जाता है. मां से मां तक की यह यात्रा देखकर ऐसा लगता है, मानो कवि अपने अंतर-ब्रह्मांड की प्रदक्षिणा कर फ़िर से अपने मूल पर, अपने जीवन-स्त्रोत पर लौट आया हो.
दूसरी विशेषता है, हर कविता के साथ संलग्न एक प्रासंगिक रेखाचित्र. विभु दत्ता द्वारा बनाए ये रेखाचित्र भी जीवंत लगते हैं और अपने-अपने काव्य-विशेष का पूरा मर्म समेटे जान पड़ते हैं.
तीसरी विशेषता है, हर कविता के अंत में बने छोटे-छोटे चिन्ह इन चिन्हों के प्रयोग से कवि में छिपी वैज्ञानिकता का आभास होता है. हर चिन्ह अपनी कविता का मूल-भाव स्पष्ट करता है.
चौथी विशेषता है, पुस्तक का शीर्षक, जिसमें अग्निगंधा शब्द का प्रयोग किया गया है. अग्निगंधा-काव्य को समझाते हुए कवि ने एक कविता में लिखा है-
काव्य नहीं ये मन की
झंझावात से उड़ती धूल है
द्रव्य-भावना नहीं
ये लौह-मनस के चुभते त्रिशूल हैं
न समझो इन शब्दों को
भावुक रचना, श्रृंगार-सी
इन शब्दों में मेरे मन की
हर चाह, दाह और आह बसी
मथित-मन में ये महकते
अग्निगंधा फूल हैं
दग्ध-दिल के ये दहकते
अग्निगंधा फूल हैं
पुस्तक के शीर्षक के संबंध में कवि अरुण ने गूढ़ दार्शनिक भाषा में स्पष्ट किया है- जब भी मन में कोई सामयिक या आकस्मिक अंधेरा व्याप्त होता है, जिसमें सभी मार्ग दिखने बंद हो जाते हैं और बाह्य-जगत का कोई भी पदार्थ वहां रोशनी नहीं कर पाता, तो मैं स्वयं का ही मन जलाता हूं, जिससे एक अग्निगंधा का वृक्ष पनपता है, जिसके प्रकाश और सुगंध लिए फूलभभविषय के लिए मेरे लक्ष्य की ओर जाने वाले मार्गों को प्रकाशयुक्त और सुगंधित बनाते हैं और जिसकी लकड़ी दीर्घ-काल तक मार्गों को प्रकाशित बनाए रखने के लिए जलाने के काम भी आती है. जब ये पुष्प और लकड़ी समाप्त या कम होने लगती है, तो मैं फिर से मन को जलाता हूं.
पांचवीं और महत्वपूर्ण विशेषता है, कवि कीभभाषा-शैली और विषय की विविधता. जहां एक ओर कवि ने संस्कृत-निष्ठ हिंदी का छंदबद्ध प्रयोग किया है, वहीं कई स्थानों पर एक उन्मुक्त खड़ी बोली का भी सुंदर तालमेल देखने को मिलता है. अरुण की कविताओं में श्रृंगार रस, करुण रस, रौद्र रस, वीर रस व शांत रस का अद्‌भुत संयोग है. रचनाएं विभिन्न प्रतीकों और लगभग सभी प्रमुख अलंकारों से परिपूर्ण हैं. कहीं उच्चकोटि का नाद-सौंदर्य, तो कहीं मनभभावन शब्द-सौंदर्य दिखता है और विषय की विविधता भी शानदार है. कवि ने एक ही पुस्तक में किसी शहीद के प्रेम पत्र से लेकर शहीदों की राख के शोधन, देशभक्ति का व्यवसायीकरण, जलियावाला बाग की आत्म वेदना, आतंकवाद की आलोचना, सांप्रदायिक-सद्‌भाव, देश के विभाजन का दर्द, प्रतिभा-पलायन की विडंबना, सत्य की विजय का विश्वास, एक नए समाज को बनाने का स्वप्न, नारी-शक्ति का गुणगान, रावण की आत्मग्लानि, प्रेमिका से प्रणय-निवेदन, विरह-वेदना, वसंत और फाग के सौंदर्य से लेकर अपने मन में छिपे देवत्व और पशुत्व, दोनों की विवेचना को स्थान दिया है.
पुस्तक के मूल-भाव के बारे में प्रकाशक का कहना है-कवि की रचनाओं में मुख्य सरोकार हैं, मातृभक्ति, राष्ट्रीयता, प्रेम, मानस-मंथन और आत्मबोध. यह भी कहा जा सकता है कि ये उनकी काव्य-सृष्टि के पंच-तत्त्व हैं. कहीं स्वतंत्र रूप में, तो कहीं सम्मिलित होकर ये तत्व उनकी रचनाओं को अलंकृत करते हैं. ये शब्द ही अपने आप में कवि की रचनाओं में उत्कृष्ट विविधता के प्रमाण हैं. बेशक, यह पुस्तक शब्दों के इंद्रधनुषी रंगों से सराबोर कविताओं का एक ऐसा संग्रह है, जिसे कोई भी बार-बार पढ़ना चाहेगा और जितना पढ़ता जाएगा, उतने ही नए अर्थ और भाव सामने आते जाएंगे.

कृति : अग्निगंधा के फूल
विधा : कविता
कवि : अरुण सिंह क्रांति
प्रकाशन : सिनमन टील प्रकाशन, गोवा
मूल्य : 250 रुपये
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