अगरबत्तियों का धुआं...

कितना भला लगता है
अगरबत्तियों का
महकता सफ़ेद धुआं...

पुरानी यादों के
कितने अक्स
उभर आते हैं...

जुमेरात को बाद अस्र के
घर में महकने लगती थीं
गुलाब की अगरबत्तियां...

अक़ीदत के चिराग़ रौशन होते
हाथ दुआ के लिए उठ जाते
जाने कौन-सी दुआएं थीं वो
अब याद नहीं...

अब भी आंगन में
अगरबत्तियां महकती हैं
कभी गुलाब की, कभी केवड़ा
और कभी संदल की ख़ुशबू वाली...

लेकिन
अब चिराग़ रौशन नहीं होते
हाथ ज़रूर उठते हैं दुआओं के लिए
ये दुआएं, जो अपने लिए नहीं होतीं...
-फ़िरदौस ख़ान

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दुनियावी रिश्ते


दुनियावी रिश्ते शर्तों पर ही हुआ करते हैं, ख़ासकर शादी का रिश्ता...
शौहर कमाकर लाता है, बीवी को घर, कपड़े, खाना और उसकी ज़रूरत की हर चीज़ उसे मुहैया कराता है... बीवी घर का कामकाज करती है, शौहर की ख़िदमत करती है... दोनों एक-दूसरे की ज़रूरतें पूरी करते हैं... शादी का रिश्ता ही एक-दूसरे की ज़रूरत पूरी करने का रिश्ता है... जहां एक ने भी दूसरे की ज़रूरत पूरी करने से इंकार किया, रिश्ता टूटने लगता है, बिखरने लगता है और अकसर रिश्ता ख़त्म ही हो जाता है... जो ख़त्म नहीं हो पाता, वो पल-पल सिसकता रहता है...

कोरे आदर्शवादी चाहें, तो इसे झुठला सकते हैं... मगर हक़ीक़त यही है...

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