एक तस्वीर...


कहते हैं कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें देखकर ख़ुशी हासिल होती है...किसी मासूम से चेहरे की मुस्कराहट आपकी सारी थकन मिटा देती है...आपको ताज़गी से सराबोर कर देती है...आप अपनी सारी उदासी और तन्हाई को भूलकर तसव्वुरात की ऐसी दुनिया में खो जाते हैं, जहां सिर्फ़ आप और आप ही होते हैं...या फिर आपका कोई अपना... हम बात कर रहे हैं एक तस्वीर की...एक ऐसी तस्वीर की, जो हमें बहुत अज़ीज़ है...इस तस्वीर का क़िस्सा भी बहुत दिलचस्प है... हम किसी काम से बाज़ार गए, वहां हमें एक फ़ोटोग्राफर की दुकान दिखाई दी... काफ़ी अरसे से हमें एक तस्वीर बड़ी करानी थी...हमने वहां बैठे लड़के से कहा कि भैया हमें इस तस्वीर की बड़ी कॉपी चाहिए...उसने कहा ठीक है- 100 रुपये लगेंगे...हमने हज़ार का एक नोट उसे पकड़ा दिया...उसने हमें नौ सौ रुपये वापस कर दिए और एक बड़ी तस्वीर दे दी...हम तस्वीर पाकर बहुत ख़ुश थे... उस वक़्त हमारे साथ हमारे एक दोस्त थे, उन्होंने कहा कि उस लड़के ने तुमसे एक ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे ले लिए...हमने कहा कि एक क्या वो दो ज़ीरो ज़्यादा लगाकर पैसे मांगता तो भी हम दे देते, क्योंकि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...यह तस्वीर हमारे लिए अनमोल है...
उस वक़्त लगा कि हमारे सामने एक गूजरी खड़ी मुस्करा रही है...एक बहुत दिलचस्प कहानी है...किसी डेरे पर एक फ़क़ीर आकर रहने लगा...वह एक पेड़ के नीचे बैठा इबादत करता... फ़क़ीर हर रोज़ देखता कि गूजरी दूध बेचने के लिए रोज़ वहां आती है...वो बहुत माप-तोल के साथ सबको दूध देती, लेकिन जब एक ख़ूबसूरत नौजवान आता तो उसके बर्तन को पूरा दूध से भर देती, यह देखे बिना कि बर्तन छोटा है या बड़ा... एक रोज़ फ़क़ीर ने गूजरी से पूछा कि तुम सबको तो बहुत माप-माप कर दूध देती हो, लेकिन उस ख़ूबसूरत नौजवान का पूरा बर्तन भर देती हो... गूजरी ने मुस्कराते हुए फ़क़ीर को जवाब दिया कि जहां प्यार होता है, वहां मोल-भाव नहीं होता...
हां, तो यह तस्वीर सिर्फ़ हम ही देख पाते हैं, क्योंकि यह हमारी डायरी में रहती है...उन नज़्मों की तरह, जो हमने सिर्फ़ अपने महबूब के लिए लिखी हैं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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विश


अजीब इत्तेफ़ाक़ है कि हमें टूटते तारे बहुत दिखते हैं... जब भी हम रात में खुले आसमान के नीचे बैठकर स्याह आसमान में चमकते चांद-सितारों को देखते हैं, तो हमें कोई बहुत ही चमकता हुआ तारा अपनी तरफ़ बढ़ता दिखता है... बहुत ही तेज़ी से वो हमारी तरफ़ आता है, उसके आसपास बहुत ही रौशनी होती है... फिर बहुत नीचे आकर वो नज़रों से ओझल हो जाता है... अकसर ऐसा होता है...  घर के फ़र्द कहते हैं कि उन्हें तो कोई टूटता तारा नज़र नहीं आया, फिर तुम्हें ही ये टूटते तारे क्यों दिखते हैं.. इसका जवाब हमारे पास नहीं है...
कहते हैं कि टूटते तारे को देखकर कोई 'विश’ मांगी जाए, तो पूरी ज़रूर होती है... छत पर देर तक जागकर चांद-तारों को निहारना अच्छा लगता है... लेकिन टूटते तारे को देखकर मन दुखी हो जाता है... इसलिए कभी टूटते तारे को देखकर कोई 'विश’ नहीं मांगी... अपनी ख़ुशी के लिए किसी का यूं टूटकर बिखर जाना, कभी दिल ने गवारा नहीं किया... शायद इसीलिए एक 'विश’ आज तक ’विश’ ही रह गई...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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भूख

एक साहब ने हमसे सवाल किया-
अगर खाना सामने रखा हो, तो क्या उसे खाये बिना पेट भर जाएगा ?

इसके दो जवाब हैं- एक दुनियावी और दूसरा रूहानी...
पहला, खाना खाये बिना पेट नहीं भर सकता... अल्लाह ने जिस्म दिया है, पेट दिया है, तो भूख भी दी है, जो खाना खाने से ही मिट सकती है...

बाज़ वक़्त खाना खाने से भी भूख नहीं मिटती... इसी से वाबस्ता एक वाक़िया है... तक़रीबन तीन साल पहले की बात है... हम भाई के घर आए हुए थे... दोपहर का वक़्त था... खाने में क़ौरमा और नान था... बहुत ज़्यादा भूख लगी हो, तो भी पौने या एक नान से पेट भर जाता है... हमने पूरा नान खाया, लेकिन
अब भी बहुत भूख लगी थी... लग रहा था, जैसे हमने एक लुक़मा तक न खाया हो... भूख में एक लुक़मा भी खा लिया जाए, तो कुछ तो तसल्ली होती है, लेकिन यहां तो वो भी नहीं... भूख से हमारा बुरा हाल था... हम पानी पीकर दस्तरख़ान से उठ गए...  शर्म की वजह से और खा नहीं सकते थे...
तक़रीबन एक-डेढ़ घंटे तक यूं ही बैचैन रहे... समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर माजरा क्या है... फिर हमने एक कटोरी में छोटी इलायची रखी देखीं... हमने एक इलायची ली... एक दुआ पढ़ी और उसे खा लिया... यक़ीन जानिये भूख ग़ायब हो चुकी थी... पेट भरे होने का अहसास होने लगा...

अब दूसरा रूहानी जवाब, जब इंसान रोज़े में होता है, तो उसके सामने दुनिया की नेमतें रख दी जाएं, तो भी उसका दिल नहीं ललचाता... इंसान जब रूहानी ज़िन्दगी जीने लगता है, तो जिस्म की ज़रूरतें उसके लिए बेमानी हो जाया करती हैं... उसे सिर्फ़ अपनी रूह की ग़िज़ा चाहिए होती है, रूह की ग़िज़ा मुहब्बत है, इबादत है... मुहब्बत और इबादत में ख़ुद को फ़ना करने में जो सुकून है, उसके सामने दुनियावी लज़्ज़तें बेमानी हैं...

अब जिस्म है, तो भूख भी होगी... ऐसे लोगों को ज़ायक़े से कोई लेना-देना नहीं होता... सिर्फ़ पेट भरना होता है, भले ही रूखी रोटी क्यों न हो... हम भूख से कम खाना खाते हैं... दिन में सिर्फ़ दो ही वक़्त खाना खाते हैं...  कई बार सिर्फ़ एक वक़्त ही खाना खाते हैं... ऐसा नहीं है कि हम जानबूझ कर ऐसा करते हैं... क़ुदरती ये हमारी आदत में शुमार है... खाने से पहले हमें एक गिलास पानी ज़रूर चाहिए...

जो लोग रूहानी ज़िन्दगी बसर करते हैं, वो हमारी इस तहरीर को अच्छे से समझ सकते हैं...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)
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मेहनत और कामयाबी

बहुत से लोग बुलंदी पर पहुंचने के लिए, अपनी कोई ख़ास पहचान बनाने के लिए जद्दो-जहद करते हैं... दिन-रात मेहनत करते हैं... इनमें से जो लोग कामयाब हो जाते हैं... दुनिया उन्हें सलाम करती है, सर-आंखों पर बिठाती है... उनकी जद्दो-जहद की तारीफ़ों के पुल बांधे जाते हैं, लेकिन जो लोग कामयाब नहीं हो पाते, वे गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं... कोई उनका ज़िक्र तक नहीं करता... उनकी मेहनत, उनकी जद्दो-जहद ज़ाया हो जाती है...
यही तो दुनिया का दस्तूर है... उगते सूरज को सलाम करना... 
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