इल्मे-सीना

इल्मे-सीना इल्मे-सीना के बारे में बहुत कम लोग जानना चाहते हैं... दरअसल, इल्मे-सीना आपको किताबों में नहीं मिलता... इसे समझना पड़ता है... और इसे समझने के लिए एक रौशन ज़ेहन और वसीह दिल चाहिए...
जिस तरह पानी को साफ़ रखने के लिए साफ़ बर्तन की ज़रूरत होती है, उसी तरह इल्मे-सीना के लिए भी दिल का साफ़ होना बेहद ज़रूरी है... इसके लिए एक ऐसा दिल चाहिए, जो ख़ुदग़र्ज़ न हो, कमज़र्फ़ न हो... इतनी समझ चाहिए कि इंसान समझ सके कि क्या सही है और क्या ग़लत है... दूसरों में ऐब तलाशने की बजाय ख़ुद के अंदर झांकना होगा... और ये जानना होगा कि कहीं हमारे चेहरे पर ही तो गर्द नहीं जमी है, और हम सारा क़ुसूर आइने को दे रहे हैं... इसके लिए ऊंच-नीच, जात-पांत और किसी भी तरह के भेदभाव से ऊपर उठना होगा... यह भी याद रखना होगा कि ख़ुदा की मख़लूक से नफ़रत करके ख़ुदा को नहीं पाया जा सकता...
कबीर चचा कह गए हैं-
पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय...
यक़ीन करें, जिसने प्रेम के ढाई आखर पढ़ लिए और समझ लिए, उसका बेड़ा पार हो गया...
(Firdaus Diary)

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परिजात के फूल...


काफ़ी अरसे पहले की बात है... हम अपने कमरे में बैठे थे, तभी हमारी आ गईं और कहने लगीं आज मन्दिर चलते हैं. हमने कहा क्या बात है, आज कोई ख़ास दिन है. वे कहने लगीं कि मन्दिर के पास मेला जैसा माहौल होता है. मन्दिर भी हो आएंगे और कुछ चूड़ियां और मोती की मालाएं भी ले आएंगे. हमें कांच की चूड़ियों और मोती की मालों का बचपन से ही शौक़ रहा है. हमने अम्मी से पूछा, तो वो कहने लगीं. ठीक है, साथ में सुशीला को भी लेती जाना. सुशीला आंटी हमारी हमसाई थीं.

हम मन्दिर गए. मन्दिर के पास पूरी हाट लगी थी. लोग ख़रीदारी कर रहे थे.. हमारी सहेलियां भी ख़रीदारी में लग गईं. सोचा जब तक सहेलियां ख़रीदारी कर रही हैं, तब तक मन्दिर की वाटिका ही देख ली जाए. वाटिका बहुत सुन्दर थी. त्रिवेणी के अलावा फूलों के कई पेड़ थे. उनमें परिजात का पेड़ भी था. पूरा पेड़ सफ़ेद फूलों से भरा हुआ था. हमने कहीं सुना था कि परिजात का पेड़ स्वर्ग का वृक्ष है और यह देवताओं को बहुत प्रिय है. रुक्मणि को परिजात के फूल बहुत पसंद थे, इसलिए श्रीकृष्ण परिजात को धरती पर ले आए थे. हम मन ही मन में रुक्मणि का शुक्रिया अदा करने लगे,  क्योंकि शायद रुक्मणि की वजह से ही आज हम इस पेड़ के इतने क़रीब थे.

पेड़ के पास बहुत से फूल बिखरे पड़े थे. हम ज़मीन पर बैठकर फूल चुनने लगे, तभी मन्दिर के पुजारी, वहां आ गए और कहने लगे कि ज़मीन से फूल क्यों चुन रही हो. इस पेड़ से जितने चाहो फूल तोड़ सकती हो. हमने पंडित जी का शुक्रिया अदा किया और परिजात के फूल तोड़कर अपने दुपट्टे में इकट्ठे करने लगे. हमने एक अंजुली फूल इकट्ठे कर लिए. तब तक हमारी सहेलियां और आंटी भी वहां आ गईं. फिर हम मन्दिर के अंदर दाख़िल हुए. वहां छोटे-छोटे मन्दिर बने थे. किसी में राम और सीता की मूर्ति थी, किसी में हनुमान जी की मूर्ति थी, किसी में देवी संतोषी की, तो किसी में किसी और देवता की मूर्ति सजी थी. आंटी ने सभी मन्दिरों में घंटी बजाकर माथा टेका. हमारी सहेलियां भी ऐसा ही कर रही थीं. हम भी सबके साथ-साथ चल रहे थे.

आख़िर में एक और मन्दिर आया, जिसमें श्रीकृष्ण की मनोहारी प्रतिमा थी. पीला लिबास धारण किए हुए. हाथ में बांसुरी और होंठों पर मोहक मुस्कान. हम सोचने लगे. श्रीकृष्ण के इसी रूप पर फ़िदा होकर रसखान से लेकर अमीर ख़ुसरो तक कितने ही सूफ़ी-संतों ने श्रीकृष्ण पर गीत रच डाले हैं. हम फ़ौरन प्रतिमा की तरफ़ बढ़े और हमारे हाथ में जितने परिजात के फूल थे, सभी श्रीकृष्ण के क़दमों में रख दिए.

तभी पंडित जी बोल पड़े- ऐसा लगता है, जैसे श्रीकृष्ण की राधा ने ही पुष्प भेंट किए हों. आंटी और हमारी सहेलियों ने पंडित जी की हां में हां मिलाई. हमने प्रसाद लिया और घर आ गए.

परिजात के फूल चुनने से लेकर श्रीकृष्ण के क़दमों में रखने तक हमने जो लम्हे जिए और वो हमारी इक उम्र का सरमाया हैं. आज भी जब परिजात के फूल देखते हैं, तो दिल को अजीब-सा सुकून महसूस होता है. हम नहीं जानते कि श्रीकृष्ण और परिजात के फूलों से हमारा कौन-सा रिश्ता है.
-फ़िरदौस ख़ान
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दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है...

एक सवाल अकसर पूछा जाता है, दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है...?
अमूमन लोग इसका जवाब भी जानते हैं... कई बार हम जानते हैं, और समझते भी हैं, लेकिन अपने ख़्यालात को, अपने अहसासात को बयान करने के लिए अल्फ़ाज़ नहीं मिल पाते... सोचा, आज इसी पर लिखा जाए...
दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है...?
फ़र्ज़ कीजिए आपको कोई काम है... आप सामने वाले से काम के लिए कहते हैं... काम उस शख़्स की पहुंच में है, यानी वो चाहे, तो फ़ौरन आपका काम कर सकता है...
इसके बावजूद वो आपका काम नहीं करता... बहाने बनाता है...
तो ये हुआ जान-पहचान वाला... अगर दोस्त होता, तो अपना काम छोड़कर आपका काम करता...
फ़र्ज़ कीजिए आपको कोई काम है... आप सामने वाले से काम के लिए कहते हैं... काम उस शख़्स की पहुंच में नहीं है, यानी वो चाहने पर भी आपका काम नहीं कर सकता है...
वो आपका काम करने की कोशिश करता है...
ये आपका दोस्त है... क्योंकि उसने आपके लिए कोशिश तो की...
बाज़ दफ़ा ऐसा भी होता है कि दोस्त आपके वक़्त पर काम नहीं आते और जान-पहचान वाले काम आ जाते हैं... अपवाद तो हर जगह ही हुआ करते हैं... हैं न...?
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ये बारिश है...

मेरे महबूब !
ये बारिश है
या
तुम्हारी मुहब्बत
जिसने
मेरी रूह तक को भिगो डाला...
-फ़िरदौस ख़ान

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दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है

एक सवाल अकसर पूछा जाता है, दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है...?
अमूमन लोग इसका जवाब भी जानते हैं... कई बार हम जानते हैं, और समझते भी हैं, लेकिन अपने ख़्यालात को, अपने अहसासात को बयान करने के लिए अल्फ़ाज़ नहीं मिल पाते... सोचा, आज इसी पर लिखा जाए...
दोस्तों और जान-पहचान वालों में क्या फ़र्क़ होता है...?
फ़र्ज़ कीजिए आपको कोई काम है... आप सामने वाले से काम के लिए कहते हैं... काम उस शख़्स की पहुंच में है, यानी वो चाहे, तो फ़ौरन आपका काम कर सकता है...
इसके बावजूद वो आपका काम नहीं करता... बहाने बनाता है...
तो ये हुआ जान-पहचान वाला... अगर दोस्त होता, तो अपना काम छोड़कर आपका काम करता...

फ़र्ज़ कीजिए आपको कोई काम है... आप सामने वाले से काम के लिए कहते हैं... काम उस शख़्स की पहुंच में नहीं है, यानी वो चाहने पर भी आपका काम नहीं कर सकता है...
वो आपका काम करने की कोशिश करता है...
ये आपका दोस्त है... क्योंकि उसने आपके लिए कोशिश तो की...

बाज़ दफ़ा ऐसा भी होता है कि दोस्त आपके वक़्त पर काम नहीं आते और जान-पहचान वाले काम आ जाते हैं... अपवाद तो हर जगह ही हुआ करते हैं... हैं न...?

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दोस्तियां...


फ़िरदौस ख़ान
कुछ लोग सिर्फ़ सोशल साइट्स तक ही महदूद हुआ करते हैं, सोशल साइट्स पर आए, तो दुआ-सलाम हो गया, वरना तुम अपने घर और हम अपने घर... कुछ लोग कारोबार यानी दफ़्तर तक की महदूद होते हैं... आमना-सामना हुआ, तो हाय-हैलो हो गई... कुछ लोग सोशल फ़ील्ड तक ही महदूद  रहा करते हैं...

कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो मेहमानों की तरह घर पर भी आ जाते है, और मेहमान नवाज़ी के बाद रुख़्सत हो जाते हैं... इन सबके बीच कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जो हमारे बावर्चीख़ाने तक आते हैं... यक़ीन मानिये, जो दोस्तियां या रिश्ते घर के बावर्चीख़ाने तक पहुंच जाते हैं... वो ताउम्र के हो जाते हैं...

हमारी बचपन से एक आदत रही है...  स्कूल से कॊलेज और कॊलेज से दफ़्तर तक जिन लोगों से हमारी आशनाई रही है, उनसे हमने घर तक का रिश्ता रखा... यानी हमारे घरवाले उन सभी लोगों को जानते हैं, और उन लोगों के घरवाले भी हमसे वाक़िफ़ हैं... ये हमने अपने परिवार से ही सीखा... पापा के दोस्तों के घरवाले और हमारी अम्मी की सहेलियों के घरवालों का हमारे घर आना-जाना रहता था... हमने भी ऐसा ही किया... त्यौहारों पर अपनी सहेलियों/ अपने दफ़्तर के सहकर्मियों को घर पर बुलाना... उनके घर जाना... इस तरह सब हमारे पारिवारिक दोस्त होकर रहे... फ़ेसबुक पर ऐसे कई लोग हैं, जो हमारे पारिवारिक मित्र हैं... अगर हमारा फ़ोन ना मिले, तो वे हमारे घर के नंबर पर फ़ोन कर लेते हैं... फ़ेसबुक पर एक ऐसे पारिवारिक मित्र भी हैं, जिन्हें हम अपनी दूसरी मां कहते हैं... क्योंकि वो हमारी इतनी ही फ़िक्र करते हैं, जितनी कोई मां अपने बच्चे की करती है...

कई साल पहली की बात है... हमारे एक आशनाई अपनी बहन के साथ घर आए... हमारी तबीयत ठीक नहीं थी... वह बोले कि भूख लग रही है... हमने कहा कि आज हमने खाना नहीं पकाया... आप शिबली से पकवा लें... कहने लगे कि अब हंस कर पकाओ या रोकर, पर खाना तुम्हारे हाथ का ही खाऊंगा... इसलिए उठो, और कुछ पका लो...
हमने मन न होते हुए भी बिरयानी पकाकर दी... उनकी बहन भी कम नहीं थी... छुट्टी के दिन आ जाती और कहती कि आज कुछ नई चीज़ खाने का मन है... चलो, कुछ पकाकर खिलाओ... हम नये-नये पकवान बनाते... कभी कोई मुग़लई पकवान बनाते, तो कभी दक्षिणी भारयीय व्यंजन... वह खाकर कहती, किसी होटल में शेफ़ थी क्या... :) हम मूवी देखते... कॊल्ड ड्रिंक्स पीते... बहुत अच्छा वक़्त बीतता...
जिस दिन उनकी अम्मी बिरयानी बनातीं, अल सुबह ही हमारे पास कॊल आ जाती कि शाम को घर पर बिरयानी पक रही है... इसलिए दफ़्तर से सीधा घर आ जाना... और दिन भर न जाने कितनी कॊल्स आतीं...

हमने घर तक का रिश्ता रखा, इसलिए स्कूल के दिनों तक की दोस्तियां आज भी क़ायम हैं... रिश्तों में उतनी ही शिद्दत और ताज़गी है, जितनी शुरू में हुआ करती है...
(ज़िन्दगी की किताब का एक वर्क़)

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अच्छे दोस्त क़िस्मत से ही मिला करते हैं


हमारे दोस्तों में अमूमन सभी तरह के लोग हैं... आस्तिक हैं, नास्तिक भी हैं... ईसाई भी हैं, मुस्लिम भी हैं, हिन्दू भी हैं, सिख भी हैं...
संघी भी हैं, जमाती भी हैं. कम्युनिस्ट भी हैं, कांग्रेसी भी हैं, समाजवादी भी हैं...
शाकाहारी भी हैं, मांसाहारी भी हैं... ऐसे लोग भी हैं, जो शराब तो क्या सिगरेट तक को हाथ नहीं लगाते. ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें शाराब न मिले, तो नींद नहीं आती...
सबसे बड़ी बात ये है कि हमारे दोस्तों में ऐसा कोई नहीं है, जो जबरन सामने वाले से अपनी बात मनवाने की कोशिश करे, और उसकी बात न मानने पर दोस्ती ख़त्म कर दे...
हमारे आपस में मतभेद हो सकते हैं, हुए भी हैं, लेकिन मनभेद कभी नहीं हुआ... यही सबसे ख़ुशनुमा बात है... हमें अपने दोस्तों पर नाज़ है... अच्छे दोस्त क़िस्मत से ही मिला करते हैं... हैं न...

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दुआ, उन्हें दें


सबसे प्यारी दुआ वो हुआ करती है, जो महबूब के लिए की जाए...महबूब को दी जाए...
जब कोई हमें लंबी उम्र की दुआ देता है, तो दिल चाहता है कि उससे कह दें-
हमारे मोहसिन ! हमारे अज़ीज़ !
हमें लंबी उम्र की दुआ मत दो, क्योंकि हमारे होने या न होने से दुनिया को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा... फ़र्क़ पड़ेगा, तो सिर्फ़ हमारे घरवालों और कुछ अपनों को...
लंबी उम्र की दुआ देनी है, तो उसे दो, जिसके होने न होने से एक दुनिया को बहुत फ़र्क़ पड़ता है... बहुतों की उम्मीदें उससे वाबस्ता हैं...
कुछ लोगों को ख़ुदा ने इतनी ताक़त बख़्शी है कि वे करोड़ों लोगों की ज़िन्दगी को बेहतर बना सकते हैं...

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